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गजल: मेरे तन को ना छुओ तुम तेरा हाथ जल न जाए...

गजल— 1121/2122/1121/2122

तेरे रूप का ये जादू कहीं मुझपे चल न जाए
यूं बिखेरो ना ये जुल्फें कहीं दिल मचल न जाए

मेरे दिल की इस जमीं पे कोई फूल खिल रहा है
तेरे प्यार का ये मौसम कहीं फिर बदल न जाए

तूने खोल दी है जुल्फें लगे दिन चढ़ा है फिर से
'न झुकाओ तुम निगाहें कहीं रात ढल न जाए'

तेरी याद का है जंगल यहां आग सी लगी है
मेरे तन को ना छुओ तुम तेरा हाथ जल न जाए

इसी सोच में हूं डूबा कि पहुंचे बात उन तक
ऐ ‘शकील’ फिर से बेकार तेरी गजल न जाए

-शकील जमशेदपुरी

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 16, 2013 at 12:59am

पहली बार आपको शायद पढ रहा हूँ क्या ?

मेहनत करें .. . शुभेच्छाएँ

Comment by Savitri Rathore on October 8, 2013 at 3:07pm

खूबसूरत अहसासों को बयां करती ग़ज़ल ......बधाई हो।

Comment by coontee mukerji on October 7, 2013 at 3:14pm

रूमानियत से ओत प्रोत ...मन को सुंदर एहसास दिलाने वाली गजल.

Comment by शकील समर on October 7, 2013 at 8:28am

आदरणीय अनंत जी, गजल सीखने की प्रारंभिक अवस्था में हूं। इस अमूल्य सुझाव के लिए आभार। इसी तरह इस्लाह करते रहें, ताकि मैं खामियों को दूर कर सकूं। पुन: आभार आपका।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on October 7, 2013 at 1:04am

सुंदर प्रयास हुआ है.

मेरे तन को ना छुओ तुम तेरा हाथ जल न जाए.......एक ही पंक्ति में तुम और तेरा का सम्बोधन खटक रहा है, शेष आदरणीय अनंत जी से सहमत हूँ.

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 6, 2013 at 10:51pm

आदरणीय शकील जी अच्छा प्रयास हुआ है किन्तु मैं संतुष्ट नहीं हो पा रहा हूँ.

तेरे, मेरे, तूने आप सभी की मात्राएँ घटाई हैं जबकि मेरे हिसाब से सभी की मात्राएँ घटाने से इनका अर्थ ही बदल जा रहा है.

तेरी याद का है जंगल यहां आग सी लगी है
मेरे तन को ना छुओ तुम तेरा हाथ जल न जाए ... यहाँ आपने ना और न का प्रयोग किया है जोकि ठीक नहीं कृपया आप भी देख लें. खैर इस प्रयास पर बधाई स्वीकारें.

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 6, 2013 at 10:19pm

सुंदर गज़ल की बधाई शकील जी ।

मेरे तन को ना छुओ तुम तेरा हाथ जल न जाए// मेरे तन को न छुओ तुम कहीं हाथ जल न जाए

Comment by नादिर ख़ान on October 6, 2013 at 8:52pm

वाह-वाह शकील भाई क्या कहने ..

शानदार प्रस्तुति ।

Comment by शकील समर on October 6, 2013 at 4:00pm

आभार आपका डॉ. अनुराग सैनी जी।

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 6, 2013 at 3:58pm

शकील भाई जी इस वहम को त्याग दे की आपकी ग़ज़ल बेकार जायेगी ! हार्दिक बधाई इस सुन्दर ग़ज़ल पर आपको !

कृपया ध्यान दे...

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