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ये दिल मांगत मोर-

दुर्मिल सवैया 

पुरबी उर-*उंचन खोल गई, खुट खाट खड़ी मन खिन्न हुआ |

कुछ मत्कुण मच्छर काट रहे तन रेंगत जूँ इक कान छुआ |

भडकावत रेंग गया जब ये दिल मांगत मोर सदैव मुआ  |

फिर नारि सुलोचन ब्याह लियो शुभचिंतक मांगत किन्तु दुआ  |

उंचन=खटिया कसने वाली रस्सी , उरदावन 

मत्कुण=खटमल 

अप्रकाशित / मौलिक 

Views: 650

Comment

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Comment by annapurna bajpai on October 10, 2013 at 1:32pm

वाह !!! आदरणीय रविकर जी इस सुंदर हास्य युक्त दुर्मिल सवैया हेतु बहुत बधाई आपको । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 9, 2013 at 1:50pm

आदरणीय रविकर जी , अति सुन्दर सवैया की रचना की आपने, हास्य मिश्रित भाव में ! बहुत बधाई !!

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 9, 2013 at 12:28pm

हाहाहा वाह आदरणीय बहुत ही सुन्दर हास्यप्रद सवैया क्या कहने बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 9, 2013 at 10:32am

शादी के लड्डू खाकर पछताने वाले समझदार कहलाते है । सवैया की बधाई रविकर भाई । 

Comment by Sushil.Joshi on October 9, 2013 at 5:30am

खूबसूरत सवैया बन पड़ा है आदरणीय रविकर जी.... बधाई हो....

Comment by Abhinav Arun on October 9, 2013 at 5:17am

बहुत सुन्दर मन को गुदगुदाने में सफल रचना  आदरणीय श्री रविकर जी ..हार्दिक हार्दिक बधाई !

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