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बचपन तब का और था, अब का बचपन और

(1)

बचपन तब का और था, अब का बचपन और |
दादी की गोदी मिली, नानी हाथों कौर |


नानी हाथों कौर, दौर वह मस्ती वाला |
लेकिन बचपन आज, निकाले स्वयं दिवाला |


आया की है गोद, भोग पैकट में छप्पन |
कंप्यूटर के गेम, कैद में बीते बचपन ||

(2)

संशोधित रूप-

तब का बचपन और था, अब का बचपन और |
तब दादी गोदी मिली, नानी से दो कौर |

नानी से दो कौर, दौर वह मस्ती वाला |
लेकिन बचपन आज, महज दिखता दो साला | |

भोजन डिब्बा बंद, अक्श आया में रब का | |
कंप्यूटर में कैद, अधिकतर अबका तबका ||

....

एक दोहे में एक लघुकथा 

दौरे दिल का दर्द इत, उत दौरे पर पूत |
सुतके दौरे बेधड़क, *पिउ बे-धड़कन *सूत ||

*पिता
*सो गया

.

मौलिक / अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 17, 2013 at 1:49am

खुद ही प्रस्तुत किया और खुद ही उसका संशोधन प्रारूप भी प्रस्तुत कर दिया.. वाह ! .. :-)))))))))

जय हो...

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 12, 2013 at 9:54pm

बहुत ही सुन्दर! बधाई!

Comment by बृजेश नीरज on October 12, 2013 at 8:04pm

वाह! बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 11, 2013 at 3:53pm

आदरणीय गुरुदेव ..दिल प्रसन्ना हो गया ..आज अपने सहयोगियों को भी सुनाया ..सबने लित्फ़ उठाया ..सादर प्रणाम 

Comment by MAHIMA SHREE on October 10, 2013 at 10:34pm

बहुत ही सुंदर .. बधाई आदरणीय

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 10, 2013 at 4:20pm

वाह आदरणीय कितनी सटीक बात कही आपने आपका जवाब नहीं कुण्डलिया छंद में अप्रितम दिल खुश हो गया लाजवाब ढेरों बधाइयाँ स्वीकारें.

Comment by वेदिका on October 9, 2013 at 11:42pm

एक दोहे में एक लघुकथा// सारी कहानी चार सांस मे ही दिखला दी!

नमन !!

Comment by Sushil.Joshi on October 9, 2013 at 8:45pm

बहुत ही सुंदर छंद एवं दोहा स्वरूपी लघु कथा...... दो पीढ़ियों के बचपन के बदलाव को बखूबी वर्णित किया है आपने आदरणीय रविकर जी.... बधाई हो...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 9, 2013 at 2:12pm

आदरणीय रविकर जी , लाजवाब कुंडलिया !!!!! बधाई !!!!  और माइक्रो लघुकथा भी बे मिसाल है !!!!बधाई !!!!!

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on October 9, 2013 at 12:33pm

 आदरणीय रविकर जी,,,शानदार,,,,,,,बधाई,,,,,,,,,,

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