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कुण्डलिया (हाय री किस्मत्)

हाय री किस्मत्

देखो सारे कर रहे, दूजा इन्क्रीमैंट,

अपना पिछले वर्ष का, बाकी है पेमैंट।

बाकी है पेमैंट, करो मत जल्दी-जल्दी,

कई ‘अटल’ हैं हाय, चढ़ानी जिनको हल्दी।

कह ‘जोशी’ कविराय, सभी किस्मत के मारे,

खाते लंगर भात, आजकल देखो सारे।

------------------------------------ सुशील जोशी

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 932

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Comment by Sushil.Joshi on November 5, 2013 at 8:43am

बहुत बहुत आभार आ0 सौरभ जी...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 17, 2013 at 1:44am

हा हा हा हा...........

बधाई हो...

Comment by Sushil.Joshi on October 15, 2013 at 3:14am

कोटि कोटि धन्यवाद आपका आदरणीय जवाहर लाल जी...

Comment by Sushil.Joshi on October 15, 2013 at 3:14am

बहुत बहुत धन्यवाद आपका आदरणीय डॉ. आशुतोश जी...

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 12, 2013 at 9:52pm

वाह वाह क्या बात है!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 11, 2013 at 3:48pm

सुंदर सहज मनभावन अभ्व्यक्ति के लिए सादर बधाई के साथ 

Comment by Sushil.Joshi on October 10, 2013 at 7:58pm

उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार आपका आदरणीया डॉ. प्राची....

Comment by Sushil.Joshi on October 10, 2013 at 7:57pm

आपके इस प्रोत्साहन हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय अरुन भाई.....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 10, 2013 at 4:57pm

बहुत सुन्दर सहज अभिव्यक्ति 

हार्दिक बधाई आ० सुशील जी 

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 10, 2013 at 3:59pm

हाहाहा बहुत ही सुन्दर आदरणीय भाई जी वाह क्या कहने बहुत ही सुन्दर कुण्डलिया छंद भाई जी बधाई स्वीकारें.

कृपया ध्यान दे...

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