For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

सार्थक दशहरा (कविता)-अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

सार्थक दशहरा

***************

धर्म की विजय हुई त्रेता में, राम ने मारा रावण को।

उसकी याद में हमने भी, हर साल जलाया रावण को॥                                 

कलियुग में मायावी रावण, रूप बदलकर आता है।              

वो भ्रष्टाचारी,  अत्याचारी,  अनाचारी कहलाता है॥          

अधर्मी रावण का पुतला, हर बरस जलाया जाता है।        

कई रूप में अंदर बैठा रावण, हँसता है, मुस्काता है॥              

अपने अंदर के रावण को , आओ, पहले जलायें हम।            

फिर कंधे में बिठा बच्चे को, रावण दहन दिखायें हम॥

****************************************************

-अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव, धमतरी ( छत्तीसगढ़ )

मौलिक- अप्रकाशित

Views: 923

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 17, 2013 at 11:08pm

हार्दिक धन्यवाद आ. विजय मिश्रजी, आ. महिमाजी ,  आ. सौरभ भाई , आ.  प्राचीजी आप सभी ने छोटी सी सामयिक रचना को सराहा पसंद किया । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 17, 2013 at 6:57pm

बहुत सुन्दर कविता हुई है. प्रवाह भी उत्तम है. बधाई स्वीकारें आदरणीय.

सादर

Comment by बृजेश नीरज on October 16, 2013 at 9:34pm

आदरणीय अखिलेश जी मेरे संशय को दूर करने के लिए आपका हार्दिक आभार!

आप अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें! ये प्राथमिकता है! बाकी चीज़ें होती रहेंगी!

सादर!

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 16, 2013 at 8:42pm

आदरणीय बृजेश नीरज जी अभी मैं किसी खास विधा और मात्राओं  से मुक्त होकर अपनी कविता मुक्त छंद की तरह लिख रहा हूँ , पद्य लयात्मक रहे इस बात का प्रयास करता हूँ । ओ बी ओ की हिंदी कक्षा का मैं छात्र हूँ आप सभी श्रेष्ठ रचनाकारों के सानिंध्य में सफलता की उम्मीद् है ।.पिछले पाँच दिनों से ज्वर से जूझ रहा हूँ और धमतरी में नेट की समस्या भी बनी रहती है  इसलिए आपकी टिप्पणी कुछ देर पहले ही पढ़ पाया । ..... सादर ।     

 

Comment by MAHIMA SHREE on October 15, 2013 at 10:58pm

अपने अंदर के रावण को , आओ, पहले जलायें हम।            

फिर कंधे में बिठा बच्चे को, रावण दहन दिखायें हम॥... सुंदर भाव है आदरणीय .. बधाई आपको

Comment by बृजेश नीरज on October 15, 2013 at 10:38pm

आदरणीय रचना पर कुछ कहने से पहले आपसे ये जानने की इच्छा है कि ये रचना है किस विधा में!

सादर!

Comment by विजय मिश्र on October 15, 2013 at 6:57pm
श्यामजी , सार्थक रचना . बधाई
Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 15, 2013 at 3:59pm

 हार्दिक धन्यवाद,  श्याम वर्माजी, अरुण शर्माजी , जितेंद्र जी, आशुतोष मिश्रजी, अभिनव अरुण जी, सुशील जोशीजी , छोटे भाई कपीश एवं गिरिराज आप सभी ने छोटी सी सामयिक रचना को सराहा पसंद किया । 

Comment by Sushil.Joshi on October 15, 2013 at 5:17am

भावों का सुंदर समावेश..... एक संदेश देती हुई इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय अखिलेश जी....

Comment by Abhinav Arun on October 14, 2013 at 7:17pm

अपने अंदर के रावण को , आओ, पहले जलायें हम।            

फिर कंधे में बिठा बच्चे को, रावण दहन दिखायें हम॥

..........सुन्दर सामयिक कामना श्री अखिलेश जी हार्दिक बधाई और साधुवाद इस संदेशपरक रचना के लिए

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई रवि जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति का संज्ञान देर से लेने के लिए क्षमा चाहता.हूँ।…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी.  आपका हार्दिक धन्यवाद "
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी "
Friday
Ashok Kumar Raktale posted blog posts
Friday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"नव वर्ष  की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और  सोच की जड़ता पर प्रहार करता…"
Friday
Sushil Sarna posted blog posts
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । "
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय अशोक रक्ताले जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दु पर सहमत…"
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजलपर उपस्थिति और सप्रेमं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। इसे बेहतर…"
Thursday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service