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यह रचना मात्र हास्य के लिए लिखी गई है। इसका किसी भी व्यक्ति विशेष या जाति विशेष से कोई सरोकार नहीं है। कृपया इसे अन्यथा न लेकर मात्र एक हास्य के रूप में स्वीकार कर अपने आशीर्वाद से अनुग्रहित करें। सादर.....

मैडम

चौबे जी का मामला, लगता डाँवाडोल।

सिर से तो फुटबॉल है, और पेट है ढोल।।

और पेट है ढोल, चले वो जैसे हाथी,

चौबन उनके संग, रहे तो खूब लजाती।

पगलाए से डाँट, डपटकर बोले क्यों बे,

उनको कहते ‘मैम’, व हमको अंकल चौबे।

 

सारे उनकी बात पे, मंद मंद मुस्काय।

चौबे जी की खोपड़ी, प्रश्न कहाँ से लाय।।

प्रश्न कहाँ से लाय, सुनो तुम मेरा उत्तर,

बेटी हुई जवान, बड़े भाई सा पुत्तर।

किंतु फिगर है सैट, अभी चौबन का प्यारे,

इसीलिए हर राह, पुकारें ‘मैडम’ सारे।

------------------------------------ सुशील जोशी

"मौलिक व अप्रकाशित"

 

संशोधित

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Comment by Sushil.Joshi on October 21, 2013 at 8:56am

हा..हा..हा...... जी शुक्रिया आपका आदरणीय सुरेन्द्र जी....

Comment by Sushil.Joshi on October 21, 2013 at 8:55am

हा..हा..हा..... आदरणीय संदीप जी.... बुरा मानना तो नहीं चाहिए..... पहले ही मैं माफी माँग चुका हूँ....... हार्दिक धन्यवाद टिप्पणी के लिए...

Comment by Sushil.Joshi on October 21, 2013 at 8:55am

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय जितेनद्र भाई....

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on October 19, 2013 at 10:20pm


प्रिय सुशील जी ..अच्छी हास्य रचना ....कभी कभी ऐसा बेमेल डांवा डोल कर हंसा तो जाता ही है लोगों को तो चौबन जी काहे ना लजा जाएँ

भ्रमर ५

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 19, 2013 at 2:13pm

बहुत सुन्दर आदरणीय जोरदार रचना है चौबे जी को बुरा तो नहीं लगेगा न

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 19, 2013 at 10:22am

बहुत बढ़िया, मजा आ गया..बहुत बहुत बधाई आदरणीय शुशील जी

Comment by Sushil.Joshi on October 19, 2013 at 7:34am

बृजेश जी.... आपकी टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद.......

Comment by Sushil.Joshi on October 19, 2013 at 7:34am

आपके प्रोत्साहन के लिए अतिश: धन्यवाद आदरणीय गणेश भाई जी....

Comment by Sushil.Joshi on October 19, 2013 at 7:33am

बहुत बहुत धन्यवाद आपका आदरणीय अजीत जी....

Comment by Sushil.Joshi on October 19, 2013 at 7:33am

आशीर्वचनों के लिए कोटि कोटि धन्यवाद आदरणीय गिरिराज जी....

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