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मिला नज़र से नज़र, सब्र आज़माते रहे,

1212 1122 1212 22  .... अंतिम रुक्न ११२ भी पढ़ा गया है ..
.

नज़र, नज़र से मिला, सब्र आज़माते रहे,
मेरे रक़ीब मुझे देख, तिलमिलाते रहे.  
. 

घटाएँ, रात, हवा, आँधियाँ करें साज़िश,
मगर चिराग़ ये बेखौफ़ जगमगाते रहे.
.

गुनाह, जुर्म, सज़ा, माफ़ आपकी कर दी,
ये कह दिया तो बड़ी देर सकपकाते रहे.
.

खफ़ा खफ़ा से रहे बज़्म में सभी मुझसे,
वो पीठ पीछे मेरे शेर गुनगुनाते रहे.  
.

मिला हमें न सुकूँ दफ्न कब्र में होकर,
किसी की ज़ुल्फ़ अदा, अश्क़ याद आते रहे. 
.

फ़रेब झूठ सरीखे, बना लिए साथी,
इबादतों में ख़ुदा को मगर भुलाते रहे.
.

पुकारता है किसे ‘नूर’ इस जहाँ में अब,
कि कश्तियाँ, तेरे साहिल ही ख़ुद डुबाते रहे.  
..........................................................
निलेश 'नूर'
मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 25, 2013 at 8:01am

शुक्रिया शुशील जी 

Comment by Sushil.Joshi on October 24, 2013 at 8:11pm

बहुत सुंदर प्रस्तुति है आ0 नीलेश जी....

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 24, 2013 at 9:08am

शुक्रिया आशुतोष जी, कुंती जी ...आभार  

Comment by coontee mukerji on October 23, 2013 at 2:14pm

बहुत सुंदर गज‌ल.दाद कूबूल करें.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 23, 2013 at 9:43am

आदरणीय इस सुंदर ग़ज़ल के हर अशार ने मुझे प्रभाबित किया बिशेष रूप से इस शेर के लिए तहे दिल बढ़ाई कबूले खफ़ा खफ़ा से रहे बज़्म में सभी मुझसे,
वो पीठ पीछे मेरे शेर गुनगुनाते रहे.  ...जीवन की एक हकीकत है ..सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 23, 2013 at 9:16am

धन्यवाद आदरणीय वीनस केसरी जी,
आप ने एक नया नज़रिया दिया है, जिसका मै भविष्य में अनुपालन करने का प्रयत्न करता रहूँगा ... इससे मुझे शब्द समायोजन में बहुत लाभ होगा .. धन्यवाद   

Comment by वीनस केसरी on October 23, 2013 at 1:06am

नज़र, नज़र में मेरा सब्र आज़माते रहे,......

मगर चिराग़ मेरे थे कि जगमगाते रहे. .......

खफ़ा खफ़ा से रहे अंजुमन में सब मुझसे....

हमें सुकूँ न मिला ....

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 22, 2013 at 11:20pm

धन्यवाद केवल जी, संदीप जी ... आभार

 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 22, 2013 at 8:09pm

आदरणीय नीलेश भार्इ जी! क्या बात है! बेहतरीन गजल.......बहुत खूब। हार्दिक बधार्इ स्वीकार करे। सादर,

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 22, 2013 at 7:16pm

वाह वाह साहब

एक के बाद एक नगीने

क्या बात है

इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिली दाद हाजिर है

जय हो

कृपया ध्यान दे...

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