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ये जो मेरे ख्याल हैं न..
दरिया में तहलील बूंदों की माफिक
तुम में अपने मायने ढूंढते हैं..
 
ये चाहें धूप में पिघल जाएँ
भाप की शक्लें पहनकर
 
या मीलों कर लें परवाज़
कहीं बादलों में छुपकर
 
 
गुलाब की पंखुड़ियों से झांकें
ओस की शक्लों में
 
या फिर किसी टूटे पत्ते
की मानिंद उड़ते रहें इधर-उधर
 
ये बहुत कोशिशों के बाद
अब भी 'तुम' तलक ही पहुँच पाते हैं..
 
तुमने तो अब ख्यालों की भी हदें बाँध दी हैं...


(तहलील= विलीन / डूबा हुआ / immersed; मायने= अर्थ / meaning; परवाज़= उड़ान)

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Comment

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Comment by विवेक मिश्र on June 15, 2011 at 11:47pm
@ Rector Kathuria Ji & Guru Ji- Aapko meri koishish roochi. Haardik aabhaar..
Comment by Rash Bihari Ravi on June 6, 2011 at 8:02pm
khubsurat
गुलाब की पंखुड़ियों से झांकें
ओस की शक्लों में
 
या फिर किसी टूटे पत्ते
की मानिंद उड़ते रहें इधर-उधर
 
ये बहुत कोशिशों के बाद
अब भी 'तुम' तलक ही पहुँच पाते हैं.
lajabab
Comment by Rector Kathuria on February 27, 2011 at 9:10pm
विवेक मिश ताहिर जी बहुत खूब...बहुत खूब....बहुत ही गहरी बात कही आपने... ....
ये बहुत कोशिशों के बाद
अब भी 'तुम' तलक ही पहुँच पाते हैं..
 
तुमने तो अब ख्यालों की भी हदें बाँध दी हैं...

Comment by विवेक मिश्र on January 24, 2011 at 7:45pm
मेरा प्रयास आपको पसंद आया. हार्दिक आभार.
Comment by आशीष यादव on January 20, 2011 at 12:07pm
विवेक सर, बहुत खुबसूरत लगी आपकी ये नज़्म| पढ़ते समय एक खुबसूरत आनंद मिल रहा है|
Comment by विवेक मिश्र on January 14, 2011 at 5:26pm
नवीन सर, भास्कर जी और अरुण जी- आपकी टिप्पणियों के लिए हार्दिक आभार.
Comment by Abhinav Arun on January 14, 2011 at 11:41am
विवेक जी खूबसूरत ख्यालों की बेहद खूबसूरत अदायगी | बहुत बढियां , बधाई ||| और संयोजित चित्र चार चाँद लगा रहे हैं >>>!!!!!
Comment by Bhasker Agrawal on January 14, 2011 at 10:13am
सुन्दर प्रस्तुति...बहुत खूब
Comment by विवेक मिश्र on January 13, 2011 at 2:05am

Shukriya Ganesh Bhai.. Aapki Tippani bahumoolya hai.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 12, 2011 at 6:16pm
ख्यालों की हदे ............शायद अभी तक नहीं बने , बहुत ही सुंदर काव्य कृति है विवेक भाई , बेहतरीन अभिव्यक्ति हेतु साधुवाद स्वीकारें |

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