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ग़ज़ल : वो पगली बुतों में ख़ुदा चाहती है

बह्र : फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

 

मेरे संगदिल में रहा चाहती है

वो पगली बुतों में ख़ुदा चाहती है

 

सदा सच कहूँ वायदा चाहती है

वो शौहर नहीं आइना चाहती है

 

उतारू है करने पे सारी ख़ताएँ

नज़र उम्र भर की सजा चाहती है

 

बुझाने क्यूँ लगती है लौ कौन जाने

चरागों को जब जब हवा चाहती है

 

न दो दिल के बदले में दिल, बुद्धि कहती

मुई इश्क में भी नफ़ा चाहती है

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 25, 2013 at 10:44pm

उतारू है करने पे सारी ख़ताएँ

नज़र उम्र भर की सजा चाहती है

बहुत सही.. वाह !

ग़ज़ल बहुत अच्छी हुई है.

क्यूँ या क्यों को गिराया जा सकता है क्या ?  देखियेगा.

सादर

Comment by ram shiromani pathak on October 25, 2013 at 8:18pm

सदा सच कहूँ वायदा चाहती है

वो शौहर नहीं आइना चाहती है/////

न दो दिल के बदले में दिल, बुद्धि कहती

मुई इश्क में भी नफ़ा चाहती है///////

वाह वाह वाह आदरणीय धरमेन्द्र  जी बहुत ही  खूबसूरत ग़ज़ल ///हार्दिक बधाई आपको /सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 25, 2013 at 5:51pm

आदरणीय धरमेन्द्र भाई , बहुत लाजवाब गज़ल कही है !!!! आपको ढेरों बधाई !!!!

न दो दिल के बदले में दिल, बुद्धि कहती

मुई इश्क में भी नफ़ा चाहती है ------------------------- बेमिसाल !!!!!!

आदरनीय इसे गलती बताना न समझें -- फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन - बह्र की तकतीअ मै कभी कर नही पाता , अगर दो एक शेरों की तक्तीअ कर के बता दें तो मेहरबानी होगी !!!!

Comment by विजय मिश्र on October 25, 2013 at 4:58pm
बहुत खूबसूरत गज़ल ,बधाई धर्मेन्द्रजी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 25, 2013 at 4:12pm

वाह आदरणीय धर्मेन्द्र जी एक और खूबसूरत ग़ज़ल

//न दो दिल के बदले में दिल, बुद्धि कहती

मुई इश्क में भी नफ़ा चाहती है//  बहुत बढ़िया शे'र है वाह

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