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दीप हमने सजाये घर-द्वार हैं  

फिर भी संचित अँधेरा होता रहा

मन अयोध्या बना व्याकुल सा सदा

तन ये लंका हुआ बस छलता रहा

 

राम को तो सदा ही वनवास है

मंथरा की कुटिलता जीती जहाँ

भाव  दशरथ दिखे बस लाचार से

खेल आसक्ति ऐसी खेले यहाँ

 

लोभ धर रूप कितने सम्मुख खड़ा

दंभ रावण के जैसा बढ़ता रहा

 

धुंध यूँ वासना की छाने लगी

मन में भ्रम इक पला, सीता को ठगा

नेह के बंध बिखरे, कमजोर हैं

सब्र शबरी का देता है अब दगा

 

अर्थ रिश्तों के आखिर बदलने लगे

शूल सुग्रीव के दिल में चुभता रहा

 

अर्थ जीवन को दें कुछ हम इस तरह 

द्वेष अब ना रहे इस संसार में 

रात काली अमावस की जो मिटे

सूर्य ऐसा उगे हर व्यवहार में

 

मन अयोध्या रहे तन हनुमान सा

भाव मन में यही बस पलता रहा 

              -  बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment by बृजेश नीरज on November 12, 2013 at 7:56pm

आदरणीया गीतिका जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by वेदिका on November 12, 2013 at 2:09pm

सब्र शबरी का देता है अब दगा//

गीत के बिम्ब बेहद सहजोर है| सुंदर और सशक्त प्रस्तुति के लिए बधाई प्रेषित करती हूँ 

Comment by बृजेश नीरज on November 6, 2013 at 9:30am

 आदरणीय सौरभ जी आपका हार्दिक आभार!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 6, 2013 at 12:34am

राम को तो सदा ही वनवास है

मंथरा की कुटिलता जीती जहाँ

भाव  दशरथ दिखे बस लाचार से

खेल आसक्ति ऐसी खेले यहाँ

बहुत सार्थक गीत हु है, भाई बृजेश जी.  दिल से बधाई स्वीकार करें..

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश नीरज on October 31, 2013 at 6:08pm

आदरणीय राजेश जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by राजेश 'मृदु' on October 31, 2013 at 2:33pm

जय हो आदरणीय, सुंदर भाव संयोजन । आपको हार्दिक बधाई, सादर

Comment by बृजेश नीरज on October 30, 2013 at 6:37pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 30, 2013 at 6:36pm

आदरणीया ज्योतिर्मई जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 30, 2013 at 6:36pm

आदरणीय लडीवाला जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by annapurna bajpai on October 30, 2013 at 6:16pm

आ0 बृजेश जी सुंदर गीता रचना हेतु आपको बहुत बधाई , ईश्वर करए सभी के दिलों तक आपकी इस रचना के भाव पहुंचे और समस्त बुराइयाँ समाप्त हो जाए । 

कृपया ध्यान दे...

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