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ग़ज़ल : सत्य मेरा बोलना ही ऐब है

बह्र : रमल मुसद्दस महजूफ

2 1  2 2  2 1  2 2  2 1 2


तंग बेहद हाथ खाली जेब है,
सत्य मेरा बोलना ही एब है,

पाँव नंगे वस्त्र तन पे हैं फटे,
वक्त की कैसी अजब अवरेब है,
( अवरेब = चाल )

जख्म की जंजीर ने बांधा मुझे,
दर्द का हासिल मुझे तंजेब है,
( तंजेब = अचकन, लम्बा पहनावा )

जुर्म धोखा देश में जबसे बढ़ा,
साँस भी लेने में अब आसेब है,
( आसेब = कष्ट )

भेषभूषा मान मर्यादा ख़तम,
संस्कारों की गिरी पाजेब है....

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by अरुन 'अनन्त' on November 7, 2013 at 12:55pm

हार्दिक आभार नीरज भाई जी

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 7, 2013 at 12:54pm

हार्दिक आभार सचिन भाई

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 7, 2013 at 12:54pm

आदरणीया सरिता जी हार्दिक आभार आपका कृपया बताएं आपको क्या गड़बड़ लगी काफिया में.

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 7, 2013 at 12:54pm

शकील भाई मैंने तो मतले में स्वर काफिया ही लिया है तो स्वर का विरोध कैसे हो रहा है कृपया बताएं मेरे हिसाब से तो काफिया दोषपूर्ण नहीं है.

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 7, 2013 at 12:52pm

आदरणीय शिज्जू सर हार्दिक आभार आपका स्नेह यूँ ही बना रहे आपने जिस शब्द को इंगित किया है उसपर जरुर बात कर स्पष्ट करूँगा.

Comment by वीनस केसरी on November 7, 2013 at 12:52am

शानदार काफिया पैमाईश है भाई ... क्या कहने ...

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 6, 2013 at 7:21pm

आदरणीय बेहतरीन गजल हुई है, हार्दिक बधाई स्वीकारें।

Comment by Neeraj Nishchal on November 6, 2013 at 7:08pm

आदरणीय अरुण भाई ये कहना मेरे ख़याल से ज्यादा सही रहेगा
कि आप ग़ज़ल लिखते नही बल्कि रचते हैं
हर ग़ज़ल में आप एक नए काफिये का निर्माण करते हैं
और काफिया भी असाधारण होता है
और उसको जिस तरह से निभाते हैं उसके लिए तो मै निशब्द हूँ
इस ग़ज़ल के लिए मै जितनी भी बधाई आपको दूँ कम ही रहेगी ।

Comment by Sachin Dev on November 6, 2013 at 6:16pm
बहुत उम्दा गजल भाई अरुण जी, हार्दिक बधाई स्वीकार करें इसके लिए !
Comment by Sarita Bhatia on November 6, 2013 at 4:40pm

अरुण बहुत बढ़िया

काफिये पर काफी मेहनत  हुई है

जेब और ऐब में कुछ गड़बड़ अवश्य है ,जैसे भाई शकील जी ने कहा  

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