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तान्या : उन खामोश क्षणों में

इन खामोश क्षणों में
चाहा था
तुमको न याद करूँ /
लेकिन
बरखा की बूँदो के साथ
मेरा मन
भीग  गया /
और याद आये वो बादल ,
जो आये , छाये
और लौट गए
बिन बरसे ही /
लेकिन
मन के आँगन में
फूटी एक नन्ही कोंपल
मुरझाई नहीं
कुछ ज्यादा हरी हुई /
और याद आया
वो सपना
जिसमे तुम थे
मै भी न था
क्योंकि
वह मेरी आँखों का ही सपना था /
और याद आई
वो सूनी, गरम दोपहरी
करती ख़ामोशी से
इंतज़ार इक आहट का /
पर कितने मौसम
बदल गए
नन्ही कोंपल भी
सूखी नहीं ,
वह सपना भी
ठहरा है पलकों पर
आँसू सा ,
अब भी
इस दिल को
हर पल इंतज़ार है
शायद उस आहट का /
फिर भी मैंने चाहा
इन खामोश क्षणों में
तुमको न याद करूँ
लेकिन बरखा कि बूंदों के साथ
मेरा मन भीग  गया ..............

मौलिक एवं अप्रकाशित
अरविन्द भटनागर ' शेखर'

Views: 545

Comment

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Comment by vijay nikore on November 10, 2013 at 2:38pm

इस मार्मिक अभिव्यक्ति के लिए साधुवाद, आदरणीय अरविन्द जी।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 10, 2013 at 12:06pm

आदरणीय अरविन्द जी ...किसी को पा लेने की इच्छा में जो मधुरता है उसे पा लेने में नहीं ..बस ये कलि यूं ही हरी रहे ..सादर बधाई के साथ 

Comment by annapurna bajpai on November 9, 2013 at 2:03pm

आ0 अरविंद जी सुंदर रचना बधाई आपको । 

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 1:27pm

अंतर्मन को छूती इस अद्भुत रचना हेतु बहुत बहुत बधाई आदरणीय अरविन्द भाई जी....

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 9, 2013 at 10:57am

आदरणीय अरविंद भाई जी बहुत ही सुन्दर हृदयस्पर्शी रचना बहुत बहुत बधाई स्वीकारें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 8, 2013 at 8:41pm

बहुत अज़ीज़ से ज़ज्बात जो जुबां पर नहीं आते बस कविता में ही ढल अर्थ पाते हैं.....उनको संजोती हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति.

हार्दिक शुभकामनाएं 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 7, 2013 at 11:07pm

इस तरह की अभिव्यक्तियों की शृंखला सी बन रही है. यह अच्छा है.

शब्द की अक्षरियों पर विशेष ध्यान दिया करें.  

एक बात और:

भींगना वस्तुतः भीगना होता है. इ्से सुधार लें.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 7, 2013 at 3:12pm

Dost kya kahoon Man to mera bhi bheeg gaya.

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