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दरवाज़ा तो मैंने ही खुला छोड़ा था 

कि तुम भीतर आओगे
और बंद कर दोगे /
मगर
खुले दरवाज़े से आते रहे
सर्द हवाओं के झोंके
और ठिठुरता रहा मैं /
चेतनाशून्य होने ही वाला था कि
किसी ने
भीतर आ के
दरवाज़ा बंद कर लिया /
अधमुंदी आँखों से मैंने देखा
वो तुम नहीं थे /
मगर वो गर्मी कितनी सुखद थी /
और फिर
ना जाने कैसे
कब से
पेड़ कि फुनगी पर
बैठा चाँद
चुपके से उतर कर
मेरी आँखों में समा गया /
और रात बीत गई ।

 

 

मौलिक एवं अप्रकाशित
अरविन्द भटनागर 'शेखर'

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 4, 2014 at 4:39am

इस रुमानी बयान में रचनाकार ने ’वो तुम नहीं थे..’ कह कर मानों रहस्य भी पिरोया है ..

मुलायम अनुभूति की प्रस्तुति-श्रेणियों के लिए हार्दिक धन्यवाद,भाईजी.

शुभेच्छाएँ

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 1, 2014 at 4:25pm

सुंदर अभिव्यक्ति

 बधाई बधाई

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 1, 2014 at 10:40am

कोमल भावों से संजोयी रचना, हार्दिक बधाई आदरणीय अरविन्द जी

Comment by ARVIND BHATNAGAR on February 1, 2014 at 8:19am

आदरणीय डॉ o प्राची  जी, कविता की  सराहना के लिए बहुत बहुत  धन्यवाद् । मेरा प्रयास सार्थक हुआ । 

Comment by ARVIND BHATNAGAR on February 1, 2014 at 8:17am

आदरणीय मीना   जी, Coontee Mukerji  जी, कविता की  सराहना के लिए बहुत बहुत  धन्यवाद् 

Comment by ARVIND BHATNAGAR on February 1, 2014 at 8:14am

आदरणीय नादिर  जी, पवन अम्बा  जी, कविता की  सराहना के लिए धन्यवाद् 

Comment by ARVIND BHATNAGAR on February 1, 2014 at 8:12am

आदरणीय ब्रजेश नीरज जी, वंदना जी, सराहना के लिए धन्यवाद् 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 31, 2014 at 9:14pm

कोमल मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति 

शुभकामनाएं 

Comment by coontee mukerji on January 31, 2014 at 8:48pm


पेड़ कि फुनगी पर
बैठा चाँद
चुपके से उतर कर
मेरी आँखों में समा गया /
और रात बीत गई ।........अति सुंदर....हार्दिक  बधाई.

Comment by Meena Pathak on January 31, 2014 at 3:51pm
बहुत सुन्दर रचना ...बधाई

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