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सवैया(मत्तगयन्द )

चाल बड़ी मनमोहक लागत, खेलत खात फिरै इतरावै !

लाल कपोल लगे उसके अरु ,होंठ कली जइसे मुसकावै !!

भाग रहा नवनीत लिये जब, मात पुकारत पास बुलावै !

नेह भरे अपने कर से फिर ,लाल दुलारत जात खिलावै !!

****************************************************** 

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 885

Comment

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Comment by ram shiromani pathak on November 13, 2013 at 6:19pm

इस अमूल्य सुझाव के लिए बहुत बहुत आभार आपका भाई अरुण शर्मा   जी ..... सादर  

Comment by ram shiromani pathak on November 13, 2013 at 6:18pm

बहुत  बहुत  आभार आपका आदरणीय सौरभ  जी .............आगे से ध्यान रखूँगा। .. सादर  

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 13, 2013 at 1:18pm

अनुज राम सवैया पर बहुत ही सुन्दर प्रयास किया है आपने अग्रजों के कहे पर ध्यान दें. प्रयास हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 13, 2013 at 1:03pm

//मुझे ऐसी  कोई  समस्या  नहीं है//

तो प्रशस्ति गान पर अपनी स्वीकृति के स्थान पर यथोचित कार्य कीजिये.  किसी रचना पर मिले सुझाव या संशोधन का फिर क्या अर्थ होता है ? 

Comment by ram shiromani pathak on November 13, 2013 at 1:03am

इस अमूल्य सुझाव  के  लिए  बहुत  बहुत  आभार आपका आदरणीय सौरभ  जी ...

////लेकिन हमारे रचनाकार लगता है अभी कई पाठकों की वाहवाही से उपजी मुग्धावस्था से अपना उत्साहवर्द्धन कर रहे हैं. अमूल्य सुझावों पर बाद में सोचेंगे.///आदरणीय सौरभ  जी  मुझे ऐसी  कोई  समस्या  नहीं है ,,,,,,,//सादर 

Comment by ram shiromani pathak on November 13, 2013 at 12:56am

इस अमूल्य सुझाव के लिए बहुत बहुत आभार आपका भाई सुशील  जी ...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 12, 2013 at 10:00pm

आदरणीय सुशील जी, आदरणीय अरुण जी के संदर्भ से आपका कहना सही है. इस प्रस्तुति पर सुझाव पहले भी आ चुके हैं. लेकिन हमारे रचनाकार लगता है अभी कई पाठकों की वाहवाही से उपजी मुग्धावस्था से अपना उत्साहवर्द्धन कर रहे हैं. अमूल्य सुझावों पर बाद में सोचेंगे.

भाईजी, यह परिपाटी ओबीओ पर भी बेतुके घर करती जा रही है कि रचना पर बस वाहवाह कर दिया जा रहा है. और हम रचनाकार अपने उत्सहवर्द्धन के लिए आभारी होते चले जाते हैं. मेरा ऐसा कहना तनिक कटु लग रहा होगा लेकिन यह मंच सीखने-समझने वालों के कार्यशाला के माहौल के लिए माना-जाना जाता है. और, सर्वोपरि, ऐसा नहीं कि हम सभी अच्छी और संयत रचनाओं पर दिल खोल कर वाहवाह नहीं करते.

सादर

Comment by Sushil.Joshi on November 12, 2013 at 9:18pm

बहुत ही सुंदर सवैया है आ0 राम भाई..... हार्दिक बधाई........ लेकिन आ0 अरुन जी के सुझावों पर ध्यान देने की आवश्यकता है......

Comment by ram shiromani pathak on November 12, 2013 at 9:10am

इस अमूल्य सुझाव के लिए  बहुत बहुत आभार आदरणीय अरुण निगम  जी  .... सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on November 12, 2013 at 9:01am

सुन्दर सवैया के लिए बधाई.सुन्दर दृश्य खींचा है. भांती जरा खटक रहा है.होंठ के साथ मुसकाती को भी एक बार देख लें...........

कृपया ध्यान दे...

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