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कविता -आत्मशक्ति पर विश्वास

जीवन एक ऐसी पहेली है जिसके बारे में बात करना वे लोग ज्यादा पसंद करते हैं जिन्होंने कदम-कदम पर सफलता पाई हो.उनके पास बताने लायक काफी कुछ होता है. सामान्य व्यक्ति को तो असफलता का ही सामना करना पड़ता है.हम जैसे साधारण मनुष्यों की अनेक आकांक्षाय होती हैं. हम चाहते हैं क़ि गगन छू लें; पर हमारा भाग्य इसकी इजाजत नहीं देता.हम चाहकर भी अपने हर सपने को पूरा नहीं कर पाते .यदि मन की हर अभिलाषा पूरी हो जाया करती तो अभिलाषा भी साधारण हो जाती .हम चाहते है क़ि हमें कभी शोक ;दुःख ; भय का सामना न करना पड़े.हमारी इच्छाएं हमारे अनुसार पूरी होती जाएँ किन्तु ऐसा नहीं होता और हमारी आँख में आंसू छलक आते है. हम अपने भाग्य को कोसने लगते है.ठीक इसी समय निराशा हमे अपनी गिरफ्त में ले लेती है.इससे बाहर आने का केवल एक रास्ता है ---आत्मशक्ति पर विश्वास;------

राह कितनी भी कुटिल हो ;

हमें चलना है .

हार भी हो जाये तो भी

मुस्कुराना है;

ये जो जीवन मिला है

प्रभु की कृपा से;

इसे अब यूँ ही तो बिताना है.

रोक लेने है आंसू

दबा देना है दिल का दर्द;

हादसों के बीच से

इस तरह निकल आना है;

न मांगना कुछ

और न कुछ खोना है;

निराशा की चादर को

आशा -जल से भिगोना है;

रात कितनी भी बड़ी हो

'सवेरा तो होना है'.

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Comment

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Comment by Shashi Mehra on July 14, 2011 at 9:30am
निराशा की चादर को |
आशा -जल से भिगोना है ||
रात कितनी भी बड़ी हो |
'सवेरा तो होना है'. || बहुत अच्छा लिख रही हो. ज़ारी रखो |
मेरी कविता की तारीफ का शुक्रिया |
Comment by shikha kaushik on January 21, 2011 at 1:04pm
आप सभी का हार्दिक धन्यवाद .लेखन   रुपी  दीपक के लिए  इस प्रकार का उत्साहवर्धन घी का काम करता है और बेहतर लेखन के लिए यह बहुत जरूरी है .शुभकामनाओं सहित .... 

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 21, 2011 at 10:16am

न मांगना कुछ
और न कुछ खोना है;
निराशा की चादर को
आशा -जल से भिगोना है;
रात कितनी भी बड़ी हो
'सवेरा तो होना है'.

 

बहुत खूब शिखा जी , सरल और सपाट शब्दों मे बहुत बड़ी बात कह गई है , बेहतरीन भाव लिये सुंदर काव्य की प्रस्तुति , बहुत बहुत बधाई |

Comment by Ratnesh Raman Pathak on January 20, 2011 at 7:39pm
ver nice and attarctive poem....according to me its most nice blog of today......
one thing i want to tell u shikha jee ....that keep trying..to write in this way

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 20, 2011 at 2:08pm
सुन्दर काव्य-प्रस्तुति के लिए मुबारकबाद स्वीकार करें !
Comment by आशीष यादव on January 20, 2011 at 1:53pm

रात कितनी भी बड़ी हो

'सवेरा तो होना है'.

पूर्ण तया सोलह आने  सच|

सुन्दर प्रस्तुति|

कृपया ध्यान दे...

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