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ग़ज़ल : क्यूँ जाति की न अब भी दीवार टूटती है

बह्र : २२१ २१२२ २२१ २१२२

 

इक दिन हर इक पुरानी दीवार टूटती है

क्यूँ जाति की न अब भी दीवार टूटती है

 

इसकी जड़ों में डालो कुछ आँसुओं का पानी

धक्कों से कब दिलों की दीवार टूटती है

 

हैं लोकतंत्र के अब मजबूत चारों खंभे

हिलती है जब भी धरती दीवार टूटती है

 

हथियार ले के आओ, औजार ले के आओ

कब प्रार्थना से कोई दीवार टूटती है

 

रिश्ते बबूल बनके चुभते हैं जिंदगी भर

शर्मोहया की जब भी दीवार टूटती है

--------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 7, 2014 at 10:17pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ सौरभ जी। स्नेह बना रहे।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 7, 2014 at 10:16pm

बहुत बहुत शुक्रिया ram shiromani pathak जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 27, 2013 at 11:03pm

हथियार ले के आओ, औजार ले के आओ

कब प्रार्थना से कोई दीवार टूटती है

वाह वाह !

Comment by ram shiromani pathak on November 23, 2013 at 9:39am

आदरणीय बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आपने बधाई............. 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 8:07pm

बहुत बहुत शुक्रिया गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 8:06pm

SANDEEP KUMAR PATEL जी, बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 8:06pm

बहुत बहुत शुक्रिया डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 8:06pm

शे’र पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया Dr Ashutosh Mishra जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 8:05pm

अरुन शर्मा 'अनन्त' जी, बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 8:05pm

Shijju Shakoor जी, बहुत बहुत आभारी हूँ जनाब।

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