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ग़ज़ल : अरुन शर्मा 'अनन्त'

बहरे रमल मुसमन महजूफ
2122 2122 2122 212

फूल जो मैं बन गया निश्चित सताया जाऊँगा,
राह का काँटा हुआ तब भी हटाया जाऊँगा,

इम्तिहान-ऐ-इश्क ने अब तोड़ डाला है मुझे,
आह यूँ ही कब तलक मैं आजमाया जाऊँगा,

लाख कोशिश कर मुझे दिल से मिटाने की मगर,
मैं सदा दिल के तेरे भीतर ही पाया जाऊँगा,

एक मैं इंसान सीधा और उसपे मुफलिसी,
काठ की पुतली बनाकर मैं नचाया जाऊँगा,

जख्म भीतर जिस्म में अँगडाइयाँ लेने लगे,
मैं बली फिर से किसी भी क्षण चढाया जाऊँगा,

जब जरुरत पर कोई भी काम आएगा नहीं,
मैं भले खोटा ही सिक्का हूँ चलाया जाऊँगा...

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by अरुन 'अनन्त' on December 9, 2013 at 12:37pm

हार्दिक आभार आदरणीय गोपाल सर

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 9, 2013 at 12:37pm

बहुत बहुत शुक्रिया नीरज नीर भाई

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 9, 2013 at 12:37pm

आदरणीय गिरिराज आपको ग़ज़ल पसंद आई बड़ी प्रसन्नता हुई हार्दिक आभार आपका.

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 9, 2013 at 12:36pm

बहुत बहुत धन्यवाद भाई सारथी साहिब

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 9, 2013 at 12:36pm

हार्दिक आभार आदरणीया कुंती मुखर्जी जी

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 9, 2013 at 12:36pm

नीरज भाई जी बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 9, 2013 at 12:36pm

हार्दिक आभार आदरणीय शिज्जू सर आपकी टिपण्णी पाकर मुग्ध हूँ ग़ज़ल कामयाब हुई तहे दिल से शुक्रिया आपका,

इम्तिहाने-इश्क कर लेता हूँ धन्यवाद.

Comment by vandana on December 9, 2013 at 8:02am

एक मैं इंसान सीधा और उसपे मुफलिसी,
काठ की पुतली बनाकर मैं नचाया जाऊँगा,

बहुत खूब आदरणीय अरुण जी 

एक छोटी सी बात पर ध्यान दिलाना चाहूंगी बली और बलि शब्द में अंतर है आप भाव के हिसाब से बलि शब्द का प्रयोग करेंगे तो कुछ परिवर्तन करना पड़ेगा 

Comment by hemant sharma on December 8, 2013 at 10:54pm


 "एक मैं इंसान सीधा और उसपे मुफलिसी,
काठ की पुतली बनाकर मैं नचाया जाऊँगा"

बहुत हि सच्ची बात कही आ. अरुन जी बधाई ......

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 8, 2013 at 10:18pm

अनंत जी

आप खोटे सिक्के नहीं है  

ग़ज़ल के कुछ अशआर बेहद खूबसूरत है i

शुभकामनाये i  

कृपया ध्यान दे...

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