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वही मै दे पाया ! … नवगीत !

वही मै दे पाया !   … नवगीत !
----------------------------------
जो था मेरे पास 
वही मै दे पाया
 
अंतर में खुशियों का सोता 
होठों पर मुस्कान 
चहरे पर है इंद्रधनुष और 
हाव-भाव में शान 
 
इठलाता मधुमास 
तुम्हारी खातिर लाया  …ज़ो था …वही मै दे पाया  
 
मन में था अवसाद 
अधर भी सूखे-सूखे 
नयन किसी दर्शन को 
जैसे  प्यासे -भूखे 
 
घुटन  नीर आभास 
यही बस लिख पाया …ज़ो था …वही मै दे पाया 
 
देने को तो दे सकता 
पर क्या है अपना
एक बार तो पूंछू 
उससे उसका सपना 
 
अपने-अपने वृत्त 
समय ने समझाया …ज़ो था …वही मै दे पाया 
 
जो था मेरे पास 
वही मै दे पाया ! …ज़ो था …वही मै दे पाया  
------------------------------------------------
अविनाश बागडे     मौलिक/अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by AVINASH S BAGDE on December 27, 2013 at 6:26am

राजेश कुमारीजी आपकी हौसला अफ़ज़ाई का ह्रदय से आभार 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 27, 2013 at 6:25am

आदरणीय आपके इस विवेचन ने मेरी रचना को  जो सम्मान दियाहै उसके धन्यवाद हेतु शब्द नहीं //सौरभ जी साधुवाद आपकी भावनाओं का। 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 27, 2013 at 1:16am

आदरणीय अविनाश भाईजी, आपके इस नवगीत की ऊँचाई अन्य विधाओं पर आपकी रचनाओं से कहीं ऊँची है.
एक-एक बन्द और उनकी आधार पंक्तियाँ अपने आप में अत्यंत समृद्ध हैं. हर बिम्ब पर मैं आपको बार-बार बधाइयाँ दे रहा हूँ.
इस नवगीत के कथ्य के लिए हृदय से बधाई लीजिये.

हाँ, यह भी अवश्य है कि आपने शिल्पपक्ष को अत्यंत हाशिये पर रख छोड़ा है. पंक्तियो की मात्रिकता बेहतर कसावट मांगती हैं
सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 26, 2013 at 10:23am
देने को तो दे सकता 
पर क्या है अपना
एक बार तो पूंछू 
उससे उसका सपना 
 
अपने-अपने वृत्त 
समय ने समझाया …ज़ो था …वही मै दे पाया 
 

वाह बहुत सुन्दर नवगीत रचा है अविनाश जी बहुत-बहुत बधाई. 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 26, 2013 at 10:21am
आदरणीय Satyanarayan Singh जी 
बहुत बहुत शुक्रिया ...
Comment by AVINASH S BAGDE on December 26, 2013 at 10:21am

 

आभार आदरणीय अरुन शर्मा 'अनन्त' जी 
बहुत बहुत शुक्रिया 
Comment by AVINASH S BAGDE on December 26, 2013 at 10:20am

महीमा जी आपके इस शब्द बल का आभारी हूँ 

Comment by MAHIMA SHREE on December 25, 2013 at 10:15pm
देने को तो दे सकता 
पर क्या है अपना
एक बार तो पूंछू 
उससे उसका सपना 
 
अपने-अपने वृत्त 
समय ने समझाया …ज़ो था …वही मै दे पाया ... ह्रदयस्पर्शी नवगीत आदरणीय अविनाश सर हार्दिक बधाई आपको .सादर 
 
Comment by Satyanarayan Singh on December 25, 2013 at 9:04pm

आ. अविनाश जी  विभिन्न मनोदशाओं की अभिव्यक्ति इस नवगीत के माध्यम से साकार हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 25, 2013 at 1:41pm

आदरणीय अविनाश भाई जी वाह बहुत ही सुन्दर मधुर नवगीत रचा है आपने बहुत बहुत बधाई आपको

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