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ठिठुरती उँगलियाँ

ठिठुरती उँगलियाँ 

ठिठुरती काँपती उँगलियाँ  

तैयार नहीं छूने को कागज़ कलम

कैसे लिखू अब कविता मैं

बिन कागज़ बिन कलम

भाव मेरे सब घुल रहे हैं

गरम चाय की प्याली में

निकले कंठ से स्वर भी कैसे

जाम लग गया ,कंठ नली में

धूप भी किसी मज़दूरन सी

 थकी हारी सी आती है 

कभी कोहरे की चादर ओढे

गुमसुम सी सो जाती है 

सुबह सवेरे ओस कणों से

भीगी रहती धरती सारी

शायद, रात कहर से आहत होकर

रोती होगी धरती प्यारी

रातें भी तो .जबरन बिन बुलाए

मेहमान सी दुख दाई है

ठिठक गया ,मानो जग सारा

शिथिलता सब तरफ छाई है

क्यों नाराज़ हुआ है

हम से ये मौसम

कैसे लिखू अब कविता मैं

बिन कागज़ बिन कलम

 

******************

महेश्वरी कनेरी

मौलिक..एवं अप्रकाशित

Views: 641

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 6, 2014 at 3:03pm

आदरणीया, यह आपकी कोई पहली रचना है जो मैं दख रहा हूँ. आपकी प्रस्तुतियों की गीतात्मकता आशान्वित करती है. सतत प्रयासरत रहें. उससे पहले पटल पर रेगुलर रहें. बहुत कुछ सार्थक होगा.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 1, 2014 at 5:32pm

जीवन की विषमताओं के चिर संगी मौसम के अवयव भी तदरूप अपने समभाव ही लगते हैं.. इसे खूबसूरत बिम्ब मिले हैं 

और इतना उदास भावातिरेक शब्द रूप में ढले भी तो कैसे ?

सुन्दर अभुव्यक्ति है आदरणीया माहेश्वरी जी 

हार्दिक शुभकामनाएं 

Comment by vijay nikore on December 31, 2013 at 1:33pm

सुन्दर भाव पिरोए हैं। बधाई, आदरणीया महेश्वरी जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 30, 2013 at 8:33pm

आदरणीया , बहुत सुन्दर रचना के लिये आपको बधाई ॥

कभी कोहरे की चादर ओढे

गुमसुम सी सो जाती है 

सुबह सवेरे ओस कणों से

भीगी रहती धरती सारी

शायद, रात कहर से आहत होकर

रोती होगी धरती प्यारी ------------ ये पंक्तियाँ खास लगीं , हार्दिक बधाई ॥

Comment by annapurna bajpai on December 30, 2013 at 7:17pm

सुंदर रचना बहुत बधाई , आपको । 

Comment by Sonam Saini on December 30, 2013 at 12:45pm

सर्दी पर अच्छा लिखा है आपने मैम, सच कहा सर्दी में उँगलियाँ भी लिखने को तैयार नही होती ! बहुत बहुत बधाई इस सुंदर रचना के मैम…

Comment by coontee mukerji on December 29, 2013 at 6:33pm

सुंदर रचना के लिये हार्दिक बधाई.सादर

Comment by annapurna bajpai on December 28, 2013 at 7:49pm

आदरणीया माहेश्वरी जी बड़ी ही सुंदर रचना , ठंड को परिभाषित करती हुई , बधाई आपको इस रचना हेतु । 

Comment by Shyam Narain Verma on December 28, 2013 at 5:36pm
बढ़िया रचना पर हार्दिक बधाइयाँ.....

कृपया ध्यान दे...

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