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रिश्तों की ताप

बर्फ सी ठंडी हथेली में, सूरज का ताप चाहिए

फिर बँध जाए मुट्ठी, ऐसे जज्बात चाहिए ।

बाँध सर पे कफन, कुछ करने की चाह चाहिए

मर कर भी मिट न सके, ऐसे बेपरवाह चाहिए।

मन में उमड़ते भावों को,शब्दों का विस्तार चाहिए

शब्द भाव बन छलक उठे,ऐसे शब्दों का सार चाहिए।

पथरा गई संवेदनाएं जहाँ , रिश्तों की ताप चाहिए

चीख कर दर्द बोल उठे,अहसासों की ऐसी थाप चाहिए।

चीर कर छाती चट्टानों की,नदी की सी प्रवाह चाहिए

अंजाम जो भी हो बस, बढ़ते रहने की चाह चाहिए ।

*************

महेश्वरी कनेरी

-मौलिक व अप्रकाशित

Views: 713

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Comment by Maheshwari Kaneri on December 26, 2013 at 9:07pm
धन्यवाद सौरव जी..

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 2:45am

इस मंच पर इस प्रस्तुति के साथ आपका हार्दिक स्वागत है, आदरणीया माहेश्वरीजी.

आप जितना हो सके इस मंच पर प्रस्तुत हुई नई-पुरानी रचनाओं को पढ़ती जायें. ढूँढ-ढूँढ कर पढ़ें.

यह अवश्य है कि बहुत कुछ मिलेगा और कई तथ्य स्पष्ट होते जायेंगें. 

सादर

Comment by vandana on December 19, 2013 at 6:49am

बहुत सुन्दर भाव आदरणीया महेश्वरी मैम

Comment by AVINASH S BAGDE on December 18, 2013 at 11:23pm

शब्द भाव बन छलक उठे,ऐसे शब्दों का सार चाहिए।..महेश्वरी कनेरी mam sunder bhaw 

Comment by Maheshwari Kaneri on December 18, 2013 at 7:08pm

सभी मित्रबंधुओ को उत्साहवर्धक टिप्पणियों के लिए आभार....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 18, 2013 at 4:45pm

भावप्रधान द्विपदियों के लिए हार्दिक बधाई आ० माहेश्वरी कनेरी जी

Comment by savitamishra on December 18, 2013 at 11:47am

bahut sundar

Comment by Shyam Narain Verma on December 18, 2013 at 10:18am
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 18, 2013 at 12:28am

सुंदर भाव से संजोयी रचना पर बधाई स्वीकारें आदरणीया

Comment by coontee mukerji on December 17, 2013 at 11:01pm

पथरा गई संवेदनाएं जहाँ , रिश्तों का ताप चाहिए

चीख कर दर्द बोल उठे,अहसासों का ऐसा थाप चाहिए।..........अति सुंदर

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