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दोस्ती .... (विजय निकोर)

दोस्ती

 

देखता हूँ सहचर मीत मेरे

सहसा, दोस्ती की निगाहें हैं झुकी हुई

पलकें भीगी

घिरते आए संत्रस्त ख़यालों पर

खरोंचते-उतरते संतप्त ख़याल ...

फिसलते भीगे गालों पर

दोस्ती के वह सुनहले रंग

बिखरते गीले काजल-से

 

कहाँ हैं दोस्ती की रोश्नी की

वह अपरिमय चिनगियाँ

बनावटी थीं क्या ? नहीं, नहीं,

चमकती थीं वह अपेक्षित आँखों में ...

रुको, माप लूँ मैं बची हुई थोड़ी-सी

उस चमक की थाहें

शायद उसी को सोचते, शा-य-द

नींद आ जाए,

कि खुरदुरी दूरियों को पार कर

भीतर के उन आवेगों में

गिरफ़तार

अँधियारे वीराने में भी

बहला लूँ

अब हुए लावारिस बेकाबू सपनो कों

आँख के खुलने तक, या क्षण-पल

साँस के रुकने तक ...

 

--------

- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 777

Comment

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Comment by vijay nikore on January 22, 2014 at 2:35pm

पीड़ा की ऐसी सहज स्वीकार्यता मन को भीतर तक भीगा जाती है ! बहुत सुंदरता से की गई भावाभिव्यक्ति//

रचना के मर्म को इस प्रकार समझ कर आपने मुझको मान दिया है। आपका हृदयतल से आभार, आदरणीय अरुण जी।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on January 22, 2014 at 2:30pm

//नम आखों में अनकहे शब्द झिलमिलाते हैं और कहते न कहते चू पड़ते हैं !! इस नरम प्रस्तुति के लिए बधाई //

 

आदरणीय सौरभ भाई, रचना की सराहना के लिए मैं आभारी हूँ। धन्यवाद।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on January 22, 2014 at 2:16pm

//भावों को बेहद सुन्दरता से पिरोया आपने  ... गहन अनुभूतियों का सफल प्रक्षेपण //

 

रचना को इस प्रकार मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय अविनाश जी।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on January 22, 2014 at 2:14pm

//वाह .. बेहद गहन अनुभूतियों का सफल प्रक्षेपण//

रचना में निहित अनुभूतियों के अनुमोदन के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीया महिमा जी।

 

सादर,

विजय निकोर

 

Comment by vijay nikore on January 22, 2014 at 2:12pm

रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय बृजेश जी।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Arun Sri on January 21, 2014 at 12:07pm

पीड़ा की ऐसी सहज स्वीकार्यता मन को भीतर तक भीगा जाती है ! बहुत सुंदरता से की गई भावाभिव्यक्ति !

Comment by vijay nikore on January 21, 2014 at 11:55am

//भावों को बेहद सुन्दरता से पिरोया आपने//

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई जितेन्द्र जी।

 

सादर और सस्नेह,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on January 21, 2014 at 11:53am

//अतीव सुंदर ,भावों में प्रोढ़ता ओढ़े पुनः एक हृदयस्पर्शी रचना के लिए अंतस से साधुवाद//

//आपके शब्द हिरनी सी कोमल भावों में कुलाँचे लगाने में बेहद माहिर हैं और पाठक इन्हें समेटते-समेटते खुद में ही बिखरने लगता है|नए साल के इस प्रसाद से अनुगृहित हुआ//

मैं आपका आभारी हूँ और ओ बी ओ का आभारी हूँ कि मेरी रचनाओं को यह मान मिल रहा है। वास्तव में मुझको लगता है कि यह रचनाएँ मैं नही लिखता...कोई अज्ञात प्रेरणा मेरी कलम से इन्हें लिख-लिख जाती है। आपका हार्दिक आभार आदरणीय विजय मिश्र जी।

 

सादर और सस्नेह,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on January 21, 2014 at 11:48am

//आपकी रचनाएँ अक्सर एक कहानी कहती हुई चलती है और पाठक  अनायास ही उस कहानी से जुड़ता चला जाता है.अतीत के कुएँ से  गूँजती कुछ आवाज़ें इंसान कहाँ तक बच सकता है.......//

इतना मान जो आप मेरी रचनाओं को देती हैं, सच आप मुझको और भी अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करती हैं। आपका आभार बार-बार आदरणीया कुंती जी।

 

सादर और सस्नेह,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on January 21, 2014 at 11:44am

/सुन्दर भाव स्थिति को शब्द देने के लिये आपको बहुत बधाइयाँ/

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई गिरिराज जी।

 

सादर,

विजय निकोर

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