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ग़ज़ल - सच को अपनाने का जब ऐलान किया !

ग़ज़ल –
फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फा
२२ २२ २२ २२ २२ २

सच को अपनाने का जब ऐलान किया ,
सबने मुझ पर बाणों का संधान किया |

जागो रण में नींदें भारी पड़ती हैं ,
अभिमन्यू ने प्राणों का बलिदान किया |

आंसू की दो बूँदें टपकी पन्नो पर ,
मैंने अपने किस्से का उन्वान किया |

सोने की अपनी अपनी लंकाएं गढ़ ,
हमने ख़ुद में रावण को मेहमान किया |

देश निकाला देकर सारे पेड़ों को ,
हमने अपने शहरों को वीरान किया |

भूख ग़रीबी महंगाई दो दिन के हैं ,
कुबड़े काने राजा ने फरमान किया |

दूषित होकर भी गंगा गंगा ही है ,
बेशक हमने अपना ही नुक्सान किया |

वृद्धाश्रम में नाम लिखाकर भूल गए ,
हमने अपनों का ऐसा सम्मान किया |

बाहर बाहर उन्नतशील लबादे हैं
भीतर भीतर मूल्यों को शमशान किया |

सच्चाई थी धोती लाठी ऐनक में ,
बापू ने उस सच्चाई का ध्यान किया |

* सर्वथा मौलिक और अप्रकाशित .

©& ® 06012014- अभिनव अरुण

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Comment by Abhinav Arun on January 8, 2014 at 5:28pm
मोहतरम जनाब नादिर साहब दिली शुक्रिया आपका . हौसलाफजाई से बेहतर की प्रेरणा मिलेगी !
Comment by Abhinav Arun on January 8, 2014 at 5:27pm
बहुत शुक्रिया आदरणीय श्री सज्जन जी ..आभार !!
Comment by नादिर ख़ान on January 8, 2014 at 4:26pm

सच को अपनाने का जब ऐलान किया ,
सबने मुझ पर बाणों का संधान किया |

जागो रण में नींदें भारी पड़ती हैं ,
अभिमन्यू ने प्राणों का बलिदान किया |

आदरणीय अभिनव जी उम्दा गज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 8, 2014 at 2:30pm
अच्छे अश’आर हुए हैं अभिनव जी, दाद कुबूलें
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 8, 2014 at 2:29pm

अच्छे अश’आर हुए हैं अभिनव जी, दाद कुबूलें

Comment by Abhinav Arun on January 7, 2014 at 7:12pm
आदरणीय महिमा जी बहुत शुक्रिया आपका ..आपको अश'आर पसंद आये ग़ज़ल कहना सार्थक हुआ ...नव वर्ष की मंगलकामनाएं आपको !!
Comment by Abhinav Arun on January 7, 2014 at 7:11pm
अभिभूत हूँ आदरणीय श्री विजय जी आपका आशीर्वाद प्राप्त हुआ , आभार और नमन आपको !
Comment by Abhinav Arun on January 7, 2014 at 7:10pm
आदरणीय श्री गिरिराज जी आभारी हूँ आपका स्नेह मिला !
Comment by MAHIMA SHREE on January 7, 2014 at 7:07pm

आंसू की दो बूँदें टपकी पन्नो पर ,
मैंने अपने किस्से का उन्वान किया |

सोने की अपनी अपनी लंकाएं गढ़ ,
हमने ख़ुद में रावण को मेहमान किया

 

दूषित होकर भी गंगा गंगा ही है ,
बेशक हमने अपना ही नुक्सान किया

 

बाहर बाहर उन्नतशील लबादे हैं
भीतर भीतर मूल्यों को शमशान किया |..... वाह वाह  .. आदरणीय अभिनव जी  अनेको बधाईयाँ.... आपके उच्चे दर्जे के  ख्याल और उम्दा लेखन दोनों मिलकर हमेशा कमाल के गज़ल कह जाते हैं ... सादर

Comment by vijay nikore on January 7, 2014 at 7:07pm

अच्छी गज़ल के लिए बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

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