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दॊहा छन्द (श्रंगार-रस)
===================

उठत गिरत झपकत पलक, दुपहरि साँझ प्रभात !!
चितवत चकित चकॊर-दृग,मुख-मयंक दुति गात !!१!!

नाभि नासिका कर्ण कुच, त्रि-बली उदर लकीर !!
ग्रीवा चिबुक कपॊल कटि,निरखत भयउँ अधीर !!२!!

हँसि हॆरति फॆरति नयन, मन्द मन्द मुस्काति !!
दन्त-पंक्ति ज्यूँ दामिनी, बिन गरजॆ चमकाति !!३!!

चॊटी  मानहुँ  कॊबरा, लटि नागिन  की जात !!
कॆश समुच्चय  कर रहा, नाग लॊक  की बात !!४!!

भरीं भुजा दॊनहुँ  सबल, उरू कॆर कॆ खम्भ !!
दॆखति कॆशव गिर पड़ॆ, भूल गयॆ सबु दम्भ !!५!!

पॊर पॊर रति चू रही , भृकुटि वलय तलवार !!

जॊ दॆखइ इक बार सॊ, पुनि पुनि रहा निहार !!६!!

चन्दा ज्यॊं आकाश मॆं, तैसहिँ बिंदिया भाल !!
कॆश गुच्छ मॆं घिर गयॆ, सॆनापति कॆ ख्याल !!७!!

निरखत मति मारी गई, मौन भयॆ मतिराम  !!
घनानन्द आनन्द झरि, टप-कत स्वॆद ललाम !!८!!

दॆखि बिहारी हुइ भ्रमित, कहॆं धन्य भगवान !!
काया पइ माया करत, कौतुक कृपा निधान !!९!!

शान्त संतुलित चित्त अरु, हाँथ हरित रूमाल !!
उपमा सबु ऊसर लगहिँ, निरखि हंसिनी चाल !!१०!!

कबहुँ गुरॆरति हाँथ लइ, चुनरी पट कर छॊर !!
कबहूँ दाँत दबाइ कइ, निरखत मनहुँ चकॊर !!११!!

रसिक लॆखनी और मसि, दॊनॊं करॆं सवाल !!
रचत विधाता कहुँ लगॆ, जानॆ कितनॆ साल !!१२!!

संयम सॆ हम बच गयॆ, वरना जातॆ  प्राण !!
कामदॆव नॆ हिय हनॆ, प्रतिपल लाखॊं बाण !!१३!!


कवि-"राज बुन्दॆली"
०८/०१/२०१४
पूर्णत:मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 1664

Comment

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Comment by annapurna bajpai on January 16, 2014 at 6:08pm

अति सुंदर दोहावली आ0 कविराज बुन्देली जी बधाई आपको । 

Comment by ram shiromani pathak on January 14, 2014 at 9:31pm

बहुत सुन्दर दोहे आदरणीय राज  भाई जी। । हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 14, 2014 at 9:20pm

हा हा हा हा.. . अब ऐसों के घन-आनन्द पर बिहारी की थाप ! .. धम्म-धम्म-धम्म ! ... . :-))))

एक-दो-तीन-चार-पाँच...  भइया, दसो के दसो गिनि भये हम, कविजी वाह वाह ! ..

एक बात :
पहिले त श्रंगार के शृंगार लिखना शुरु करौ, तबै हम पतियायें जे गप्प निकहा सुगढ़ हुई लगी.

शुभेच्छाएँ

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 9, 2014 at 11:44pm

आदरणीय,,,,,,,,,अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव ,,,,,,,,,,,,जी भाई साहब,,आपकी प्रतिक्रिया से हृदय गद-गद हो गया,,,,,और बहुत प्रोत्साहन मिला है,,,इस स्नेह के लिये दिल से आभारी हूं आपका,,,,,,,,,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 9, 2014 at 11:43pm

आदरणीया,,,,,,,shashi purwar ,,,,,,,आपसे बहुत प्रोत्साहन मिला है,,,इस स्नेह के लिये दिल से आभारी हूं आपका,,,,,,,,,,,,,,,,

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 9, 2014 at 10:10pm

प्राचीन रसिक  कवियों को याद करते हुए सुंदर दोहे रचे  हैं राज भाई , हार्दिक बधाई॥ 

Comment by shashi purwar on January 9, 2014 at 10:08pm

waah kavi ji sundar dohe waah waah waah badhai apako

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 9, 2014 at 9:27pm

ajay kumar sharma ,,,,,,,,जी,,,बहुत बहुत धन्यवाद,,,,सराहना एवं प्रोत्साहन के लिये,,,,,,

Comment by Ajay Agyat on January 9, 2014 at 9:13pm

अति उत्तम

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 9, 2014 at 5:00pm

भाई,,,,,अरुन शर्मा 'अनन्त' ,,,,जी,,आपकी प्रतिक्रिया से हृदय गद-गद हो गया,,,,,और बहुत प्रोत्साहन मिला है,,,इस स्नेह के लिये दिल से आभारी हूं आपका,,,,,,,,,,,,,,,,

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