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कभी सोचा न था ...
कितनी कलरफुल थी
मेरी दुनिया
अब तुम्हारे बाद
ब्लैक एंड वाइट होकर रह जाएगी
कभी सोचा न था ...
अलमारी में पड़े
लाल गुलाबी कपड़े
मुंह चिड़ाएंगे और पूछेंगे
मुझसे कई सवाल
कभी सोचा न था ..
आइने के सामने आज
खड़े होने में डर लगेगा

क्योंकि
खो दूंगी वो अक्स
जो मुझे निहारा करता था
कभी सोचा न था ...
बड़ी बेपरवाह थी जिन्दगी
बस तुम्हे बताकर
दुनिया की परवाह किये बिना
स्वछन्द घूमा करती थी
अब घर से बाहर कदम रखने से पहले
मेरा ही ज़मीर मुझसे सवाल पूछेगा
कभी सोचा न था.....
मैं भी एक दिन
रंगीन उड़ती तितली की तरह
अपने पर खो दूंगीं

कटी पतंग सी हो जाऊँगी
कभी सोचा न था .....
फैसले तो पहले भी
खुद लिया करती थी
पर उन पर
मोहर लगाने वाला ही नहीं रहेगा
कभी सोचा न था...
कभी कोई फॉर्म भरते हुए
मेरी कलम
विवाहिता के कालम पर
अटक जाएगी
कभी सोचा न था .....

.................................

 मौलिक व् अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 17, 2014 at 11:05pm

कुछ भी कहाँ रुकता कभी ?!!..

Comment by Sarita Bhatia on January 17, 2014 at 9:39pm

आदरणीय सौरभ sir पता नहीं कब दर्द कलम के रास्ते शब्दों में बिखर गया ,आइन्दा कोशिश करुँगी 

जब जब ऐसी रचनाएँ दोबारा पढ़ती हूँ तो मेरा भी दर्द आँसू बन बह जाता है आप सबकी हौंसला अफसाई से मन जरा हल्का हो जाता है | 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 14, 2014 at 11:14pm

निश्शब्द हूँ, आदरणीया.

कई-कई बिम्ब लगातार नये होते गये हैं अपने नये-नये मिले अर्थों के साथ. और....  अंत तक आते-आते हूक सी उठती है और आँखें बेसाख़्ता सजल हो गयीं.

भौतिक बहाव ही नहीं नदी की अंतरधारा भी बहुत कुछ कहती है. उसके साथ बहते जाना उर्ध्व गति के साथ त्वरण में आने का कारण हुआ करता है.

आगे लिखते रहिये.. खूब-खूब-खूब लिखिये.  मगर, प्लीज, ऐसे मत लिखियेगा.

.........

.........

.........

Comment by ram shiromani pathak on January 14, 2014 at 9:36pm

बहुत मार्मिक  आदरणीया सरिता जी। । हार्दिक बधाई आपको 

Comment by नादिर ख़ान on January 10, 2014 at 9:34pm

दर्द बोलेगा और हम

बधाई देंगे

कभी सोचा न था 

आदरणीया सरिता जी, दिल को भेदती अभिव्यक्ति ......

Comment by Sarita Bhatia on January 10, 2014 at 2:16pm

सभी का हार्दिक आभार 

मेरी दिली आवाज आपके दिल तक पहुँची


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on January 10, 2014 at 9:21am

मन का मर्म उतर आया है, उफ्फ..............................


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 10, 2014 at 7:55am

आदरणीया सरिता जी , एक एक शब्द आँसुओं को  सोखे हुये लग रहे हैं , बहुत मर्मस्पर्शी रचना है , दिल से कही बात सीधे दिल तक पहुंच रही है ॥ आपको अनेकों बधाइयाँ ॥

Comment by coontee mukerji on January 10, 2014 at 1:47am

बहुत मर्मस्पर्शी  रचना सरीता जी.....दिल छू गया. शुभकामनाएँ

Comment by कल्पना रामानी on January 9, 2014 at 10:27pm

कभी सोचा न था...
कभी कोई फॉर्म भरते हुए

मेरी कलम
विवाहिता के कालम पर
अटक जाएगी
कभी सोचा न था .....

बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति,  सरिता जी मन को छू गई आपकी कविता। दिल से बधाई आपको

सादर

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