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ग़ज़ल : आँखों में जो न उतरे वो दिल तलक न पहुँचे

बह्र : २२१ २१२२ २२१ २१२२

रस्ते में जिस्म आया मंजिल तलक न पहुँचे

आँखों में जो न उतरे वो दिल तलक न पहुँचे

 

मंजिल मिली जिन्हें भी मँझधार में, उन्हीं पर

कसता जहान ताना, साहिल तलक न पहुँचे

 

जो पिस गये वो चमके हाथों की बन के मेंहदी

यूँ तो मिटेंगे वे भी जो सिल तलक न पहुँचे

 

मैं चाहता हूँ उसकी नज़रों से कत्ल होना

पर बात ये जरा सी कातिल तलक न पहुँचे

 

घटता है आज गर तो कल बढ़ भी जायेगा, पर

जानम ये प्यार अपना बस निल तलक न पहुँचे

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 682

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 31, 2014 at 8:46pm

बहुत बहुत शुक्रिया sarika choudhary जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 31, 2014 at 8:46pm

बहुत बहुत शुक्रिया Shyam Narain Verma जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 31, 2014 at 8:46pm

बहुत बहुत धन्यवाद MAHIMA SHREE जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 31, 2014 at 8:45pm

बहुत बहुत धन्यवाद Saurabh Pandey जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 31, 2014 at 8:45pm

बहुत बहुत शुक्रिया ram shiromani pathak जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 31, 2014 at 8:44pm

बहुत बहुत शुक्रिया गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 31, 2014 at 8:43pm

बहुत बहुत धन्यवाद Dr.Prachi Singh जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 31, 2014 at 8:40pm

बहुत बहुत शुक्रिया जितेन्द्र 'गीत' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 31, 2014 at 8:38pm

बहुत बहुत शुक्रिया वीनस जी

Comment by वीनस केसरी on January 20, 2014 at 3:04am

मैं चाहता हूँ उसकी नज़रों से कत्ल होना

पर बात ये जरा सी कातिल तलक न पहुँचे

वाह भाई शानदार ग़ज़ल ... ढेरो दाद

कृपया ध्यान दे...

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