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बोगेनविलिया की पंखुड़ियाँ

बोगेनविलिया की पंखुड़ियाँ
शायद खिलने वाली हैं...

तुमने कल की सारी बातें
जल्दी जल्दी चुन चुन कर,
अपनी जेबों में भर ली हैं
कितनी बेतरतीबी से,
कुछ तो खोकर भूल गयी हैं,
पर कुछ गिरने वाली हैं...

उस दिन कितनी कोशिश करके
हमने धूप बिछायी थी,
अल्फ़ाज़ों की कुछ शाखों से
कुछ पत्ते भी टूटे थे,
उन पर ठहरी खामोशी की
बूँदें झरने वाली हैं...

अलसाये नाज़ुक होठों की
हिलती डुलती टहनी पर,
कोहरे वाले मौसम में भी
पीली कलियाँ उगती हैं,
भीनी ख़ुशबू छूकर सारी
बातें खुलने वाली हैं...

बोगेनविलिया की पंखुड़ियाँ
शायद खिलने वाली हैं...

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by अरुन शर्मा 'अनन्त' on January 17, 2014 at 1:40pm

भाई अजय कुमार जी बहुत सुन्दर गीत रचा है आपने पसंद आया बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by बृजेश नीरज on January 17, 2014 at 7:52am

अच्छा प्रयास है! आपको हार्दिक बधाई!

इस तरह का शब्द-चयन और कहन का ढंग आकर्षित करता है लेकिन भाई कहते समय थोड़ी सावधानी भी बरतने की जरूरत होती है.

Comment by रमेश कुमार चौहान on January 16, 2014 at 10:52pm

बहुत सुंदर, सार्थक प्रयास  के लिये बधाई बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2014 at 10:22pm

सिटी-कल्चर में पली-बढ़ी रुमानी भावनाओं को सार्थक शब्द देने का प्रयास हुआ है. बोगेनविलिया की जगह हरसिंगार का होना पृष्ठभूमि में कितना अंतर कर देता ?.. है न !

प्रस्तुत गीत में इस सायास प्रयोग के लिए पुनः बधाइयाँ.

Comment by annapurna bajpai on January 16, 2014 at 6:55pm

अति सुंदर रचना , बहुत बधाई आपको आ0 अजय कुमार जी । 

Comment by अजय कुमार सिंह on January 16, 2014 at 2:59pm

आदरणीय श्याम जी, गणेश जी, मीना जी, डॉ प्राची जी, कुन्ती जी, गिरिराज जी ! नवगीत रचना की ओर यह मेरे प्रारम्भिक प्रयासों में से एक है. आप सबकी दृष्टि में यह रचना आयी, मैं इसी को इसकी सार्थकता समझता हूँ. आप सभी का हार्दिक धन्यवाद. आदरणीया कुन्ती जी ने बिम्ब के जिस दोष की ओर इशारा किया है, मैं भी उससे अंशतः सहमत हूँ. साथ ही रचना की इतनी छोटी सी त्रुटि पर ध्यान देने के लिये और उसे सामने लाने के लिये आभारी हूँ. बिम्ब की यह विसंगति मेरे ध्यान में रचना करते हुये भी आयी थी, लेकिन यदि आप सूक्ष्मता से देखें, तो गीत की आत्मा ही प्रिय के मधुर सान्निध्य के रंग से चित्रित है. इस स्थिति में बोगेनविलिया जैसे शुष्क पुष्प में भी खुशबू का अनुभव गीत के मूलभाव से असंगत नहीं जान पड़ता है. इसीलिए मैंने जानबूझकर ही इस बिम्ब का प्रयोग किया है. आशा है, इस बिम्ब के साथ भी रचना स्वीकार्य होगी. -सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 15, 2014 at 9:16pm

आदरणीय अजय भाई , लाजवाब गीत रचना के लिये आपको हार्दिक  बधाइयाँ ॥

Comment by coontee mukerji on January 15, 2014 at 5:21pm

भीनी ख़ुशबू छूकर सारी
बातें खुलने वाली हैं...

बोगेनविलिया की पंखुड़ियाँ
शायद खिलने वाली हैं.......ध्यान रखने  वाली बात बोगन वेलिया  से खुशबू  नहीं आती है.....किसी और फूल का नाम रखियेगा. आपकी यादें सार्थक हो जाएगी....बहुत ही सुंदर  रचना है.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 15, 2014 at 3:44pm

बहुत सुन्दर सरस मनमोहक नवगीत हुआ है 

उस दिन कितनी कोशिश करके
हमने धूप बिछायी थी,
अल्फ़ाज़ों की कुछ शाखों से
कुछ पत्ते भी टूटे थे,
उन पर ठहरी खामोशी की
बूँदें झरने वाली हैं............................स्मृतियों को शब्द चित्र में कैद कर के स्वप्न बुनना..बहुत सुन्दर !

हार्दिक बधाई इस सुन्दर नवगीत पर 

Comment by Meena Pathak on January 15, 2014 at 2:59pm

अलसाये नाज़ुक होठों की
हिलती डुलती टहनी पर,
कोहरे वाले मौसम में भी
पीली कलियाँ उगती हैं,
भीनी ख़ुशबू छूकर सारी
बातें खुलने वाली हैं...

बोगेनविलिया की पंखुड़ियाँ
शायद खिलने वाली हैं................ बहुत सुन्दर रचना .. बहुत बहुत बधाई आप को 

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