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रिश्तों का अलंकार बनूँगी माँ

रिश्तों का अलंकार बनूँगी माँ

 

इंद्र्धनुष के समाये हें मुझमें सातों रंग

हर कली में ममता का श्रंगार करूंगी माँ।

बंद कली खिल जाने दे, नई सृष्टि रच जाने दे,

इस जग में आकर प्रकृति का उपहार बनूँगी माँ।

 

माँ तू अपना ही अस्तित्व मिटाने में लगी,

गुनहगार बन क्यूँ लिंगानुपात घटाने में लगी।

तेरे कलेजे का टुकड़ा हूँ, मैं तेरा ही तो मुखड़ा हूँ

आँगन में आकर तेरी पायल की झनकार बनूंगी माँ।

 

माँ तेरी ममता आज क्यूँ इस तरह बिखरने लगी

सारी इंसानियत तेरे इस कदम से सिहरने लगी.

बेशक तेरी कोख में बंद हूँ, पर मैं मुकम्मल छंद हूँ,

दुनियाँ में आकर रिश्तों का अलंकार बनूँगी माँ।

(मौलिक और अप्रकाशित) 

डॉ० ह्रदेश चौधरी                                                                                     

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Comment

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Comment by vijay nikore on January 18, 2014 at 1:04pm

एक बहुत ही दर्दीले विषय पर अति सुन्दर, मार्मिक अभिव्यक्ति। बधाई, आदरणीया ह्र्देश जी।

 

सादर,

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2014 at 10:03pm

इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई.. .

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 16, 2014 at 1:35pm

आदरणीया डॉ. साहिबा बेहद सुन्दर प्रस्तुति रचना का भाव दिल को छू गया. बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

बेशक तेरी कोख में बंद हूँ, पर मैं मुकम्मल छंद हूँ,

दुनियाँ में आकर रिश्तों का अलंकार बनूँगी माँ। ... इन दो पंकियों पर विशेष बधाई स्वीकारें.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 16, 2014 at 10:23am

अति सुंदर रचना, बधाई स्वीकारें आदरणीया हृदेश जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 15, 2014 at 8:49pm

आदरणीया , बहुत सुन्दर प्रस्तुति है ॥ आपको बधाई ॥

Comment by Savitri Rathore on January 15, 2014 at 8:19pm

अति सुन्दर हृदेश जी..... बधाई हो एक अच्छी रचना हेतु !

Comment by ram shiromani pathak on January 15, 2014 at 6:37pm

सुन्दर प्रस्तुति आदरणीया। ……।   हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 15, 2014 at 4:04pm

गर्भस्थ कन्या की माँ से जीवन की याचना बहुत सुन्दर लगी 

हार्दिक बधाई इस सार्थक सुन्दर रचना पर आ० डॉ० हृदेश जी 

कृपया ध्यान दे...

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