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ग़ज़ल : - बनारस के घाट पर

ग़ज़ल : - बनारस के घाट पर

 

कुछ था ज़रूर खास बनारस के घाट पर ,

धुंधला दिखा लिबास बनारस के घाट पर |

 

घर था हज़ार कोस मगर फ़िक्र साथ थी ,

मन हो गया उदास बनारस के घाट पर |

 

संज्ञा क्रिया की संधि में विचलित हुआ ये मन

गढ़ने लगा समास बनारस के घाट पर |

 

दुनिया के रंग देख कर हर रोज ही कबीर ,

करता है अट्टहास बनारस के घाट पर |

 

बदरंग हुआ जल तमाम मछलियाँ मरीं ,

किसका हुआ निवास बनारस के घाट पर |

 

फिर आओ भगीरथ नयी सी गंगा बुलाओ ,

गाता है रविदास बनारस के घाट पर |

 

जमने लगी है आरती उत्सव भी हो रहे ,

फिर से जगी है आस बनारस के घाट पर |

 

काशी को बम का खौफ अमाँ भूल जाईये ,

मत बोइये खटास बनारस के घाट पर |

 

दीना की चाट  खूब तो अख्तर की मलइयो ,

रिश्तों में है मिठास बनारस के घाट पर |

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Comment

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Comment by Sujit Kumar Lucky on February 2, 2011 at 12:29am

आज मन तरंग उठा फिर वही ..बनारस के घाट पर ..बहुत अच्छी रचना ..
Comment by Tilak Raj Kapoor on February 1, 2011 at 5:18pm

आपको शायद पहली बार पढ़ रहा हूँ। खूबसूरत ग़ज़ल के लिये बधाई, विशेषकर एक अभिनव रदीफ़ के लिये।

Comment by रंजना सिंह on February 1, 2011 at 4:43pm

 

संज्ञा क्रिया की संधि में विचलित हुआ ये मन

गढ़ने लगा समास बनारस के घाट पर |

लाजवाब...लाजवाब...लाजवाब ....

बदरंग हुआ जल तमाम मछलियाँ मरीं ,

किसका हुआ निवास बनारस के घाट पर |

मन दुखी और आक्रोशित कर देता है यह....

पर आस बंधाते हुए आपने डूबते मन को सहारा दे दिया... 

जमने लगी है आरती उत्सव भी हो रहे ,

फिर से जगी है आस बनारस के घाट पर |

 

अद्वितीय रचना पढवाई आपने...

मन हरा हो गया....

आभार..

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