बहर-ऽ।ऽऽ ऽ।ऽऽ ऽ।ऽऽ ऽ।ऽ
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झील के पानी में गिर के चाँद मैला हो गया।
स्वाद मीठी नींद का कड़वा-कसैला हो गया॥
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दो घड़ी भी चैन से मैं साँस ले पाता नहीं,
यूँ तुम्हारी याद का मौसम विषैला हो गया।
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सभ्यता के औपचारिक आवरण से ऊब कर,
आदमी का आचरण फिर से बनैला हो गया।
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आँख में मोती नहीं बस वासना की धूल है,
प्यार देखो किस क़दर मैला-कुचैला हो गया।
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हर किसी को सादगी के नाम से नफ़रत हुई,
कल जिसे कहते थे मजनूँ,आज लैला हो गया।
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खेत-खलिहानों की लज़्ज़त कंकरीटों में कहाँ,
हर नई पीढ़ी का बचपन बंद थैला हो गया॥
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-मौलिक एवं अप्रकाशित।
-21.01.2014
Comment
जिंदाबाद ग़ज़ल हुई है !
आँख में मोती नहीं बस वासना की धूल है,
प्यार देखो किस क़दर मैला-कुचैला हो गया।....अच्छे अच्छे उपमान का प्रयोग हुआ है ! मजा आ गया !
भइया मन से कही ग़ज़ल को मन से पढा हमने. और खुश हुए. छोटी-छोटी बातों की सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई.. .
वाह! बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आपने! बहुत-बहुत बधाई!
वाह रवि प्रकाश भाई हमेशा की तरह एक और धारदार शानदार ग़ज़ल आई है आपकी सभी अशआर बहुत ही सुन्दरता से गढ़े गए हैं इतना ही कहूँगा .आपकी ग़ज़ल बेहद रास आई, रवि प्रकाश भाई. ढेरों दिली दाद कुबूल फरमाएं.
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