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ज्यों प्रसून जल-जन्य ( दोहावली) //डॉ० प्राची

नत-मस्तक वंदन करूँ, हे प्रभु! प्राणाधार

तमस क्षरण कर ज्ञान का, प्रभु कीजै विस्तार

कर्म रती या रिक्त मन, हो सुमिरन अविराम 

क्षणिक न विस्मृत उर करे, प्रभु तव शुचिकर नाम 

नयन मूँद - अन्तः रमे, दर्शन - तव विस्तार 

झंकृत वीणा तार पर, श्रव्य मधुर मल्हार 

क्षणभंगुर जग बंध से, मुक्त रहे चैतन्य 

नित्य पंक अस्पृष्ट है, ज्यों प्रसून जल-जन्य

प्राप्य प्रयोजन पूर्ण कर, हो विदीर्ण स्वयमेव 

विरह मिलन भव मुक्त उर, यदि विनष्ट अहमेव 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 4, 2014 at 11:37am

दोहावली के भाव आप सब सुधि जनों के हृदय तक पहुचें...और इनकी सार्थकता कर आप सभी का अनुमोदन प्राप्त हुआ.

हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ.

सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 4, 2014 at 4:55am

संभव जागृत शुद्ध मन समझे अनहद नाद

किन्तु हुआ वर्णन कहाँ गूँगे से गुड़-स्वाद !

फिरभी, आपने अपने दोहों के माध्यम से बहुत कुछ सार्थक अभिव्यक्त किया है, आदरणीया प्राचीजी.. इन दोहों के लिए हार्दिक धन्यवाद. 

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश नीरज on February 2, 2014 at 10:03pm

आदरणीया प्राची जी, बहुत सुन्दर दोहावली! शब्द-शब्द उस परमपिता से एकनिष्ठ हो जाने को विवश कर रहा है! अपने स्व को त्याग कर उस परम शक्ति में रम जाने में ही जीवन है और उसकी सार्थकता भी!

आपको बहुत-बहुत बधाई!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 2, 2014 at 9:18am

सुंदर सात्विक दोहावली पर बधाई स्वीकारें आदरणीया डा. प्राची जी

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 1, 2014 at 9:22pm

क्षणभंगुर जग बंध से, मुक्त रहे चैतन्य 

नित्य पंक अस्पृष्ट है, ज्यों प्रसून जल-जन्य..आदरणीया प्राची जी परम पिता परमेश्वर को समर्पित ये दोहे दिल को बेहद भाये ..आपके साहित्यिक बैबिध्य के नमन करते हुए ..सादर 

Comment by vandana on February 1, 2014 at 9:16pm

नयन मूँद - अन्तः रमे, दर्शन - तव विस्तार 

झंकृत वीणा तार पर, श्रव्य मधुर मल्हार 

बहुत सुन्दर आध्यात्मिक दोहे आदरणीया प्राची जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 1, 2014 at 9:02pm

दोहावली के भावार्थ को पसंद कर अनुमोदित करने के लिए आप सभी सुधिजनो का हृदय तल से आभार..

Comment by annapurna bajpai on February 1, 2014 at 6:51pm

बहुत सुंदर , गहन अर्थ एवं सुंदर शिल्प , आपकी इस अनुपम रचना हेतु bahut बधाई । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 1, 2014 at 6:24pm

आदरणीया  प्राची जी , दोहों के माध्यम से परम पिता से बहुत सुंदर सात्विक प्रार्थना  हुई है  ॥ आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 1, 2014 at 4:37pm

प्राप्य प्रयोजन पूर्ण कर, हो विदीर्ण स्वयमेव 

विरह मिलन भव मुक्त उर, यदि विनष्ट अहमेव                                                   ये है गीता का ज्ञान

अध्यात्म चिंतन मनन करने बाध्य करती सभी दोहे

आदरणीया दीदीजी नमन सह बधाई

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