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सरस्वती वंदना (गीतिका छंद)

हे भवानी आदि माता, व्याप्त जग में तू सदा ।
श्‍वेत वर्णो से सुशोभित, शांत चित सब से जुदा ।।
हस्त वीणा शुभ्र माला, ज्ञान पुस्तक धारणी ।
ब्रह्म वेत्ता बुद्धि युक्ता, शारदे पद्मासनी ।।

हे दया की सिंधु माता, हे अभय वर दायनी ।
विश्‍व ढूंढे ज्ञान की लौ, देख काली यामनी ।।
ज्ञान दीपक मां जलाकर, अंधियारा अब हरें ।
हम अज्ञानी है पड़े दर, मां दया हम पर करें ।।
---------------------------
मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by ram shiromani pathak on February 10, 2014 at 2:33pm

बहुत ही सुन्दर प्रयास हुआ है जी,भाई ऐसे ही लिखते रहें  .   शुभ  शुभ

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 7, 2014 at 7:54pm

आदरणीय सौरभजी, मात्रा गणना में त्रुटि हुई है इस ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिये हार्दिक आभार । इस पोष्ट में संशोधन के क्या उपाय है?


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 6, 2014 at 5:13pm

गीतिका छंद पर संयत प्रयास करने के लिए हार्दिक बधाई, भाई रमेशजी.

अंधियारा और अज्ञानी की मात्रायें छंद की मात्रिकता के हिसाब से क्रमशः ११२२ तथा २२२  होंगी. किन्तु इस तरह से प्रयोग न होने के कारण गेयता भंग हो गयी है. देख लेंगे.

बहरहाल, आपका अभ्यास सुगढ़ है.

शुभेच्छाएँ

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 6, 2014 at 10:56am

आदरणीय अन्पूर्णाजी सादर आभार आपका

Comment by annapurna bajpai on February 6, 2014 at 1:42am

सुंदर अति सुंदर गीतिका छंद माँ चरणों मे अर्पित किया है आपने , बधाई आपको आ0 रमेश कुमार जी । 

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 5, 2014 at 10:22pm
आदरणीय भंडारीजी, जितेन्द्रजी तथा आदरणीया कुतीजी आपलोगो के सराहना के लिये सादर धन्यवाद । आदरणीय भंडारीजी अटकाव दूर करने का प्रयास कर रहा हू । सादर आभार
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 4, 2014 at 11:06pm

बसंत पंचमी के पावन पर्व पर बहुत सुंदर रचना , बधाई आदरणीय रमेश जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 4, 2014 at 10:31pm

आदरणीय रमेश भाई , गीतिका छंद  की सुन्दर प्रस्तुति के लिये आपको हार्दिक बधाई ॥ अंतिम दो पंक्ति मे पढने मे अटकाव है , मुझे छंद ज्ञान नही है , अतः गुणीजनो राय अनुसार काम करें ॥

Comment by coontee mukerji on February 4, 2014 at 9:55pm

हे दया की सिंधु माता, हे अभय वर दायनी ।
विश्‍व ढूंढे ज्ञान की लौ, देख काली यामनी ।।
ज्ञान दीपक मां जलाकर, अंधियारा अब हरें ।
हम अज्ञानी है पड़े दर, मां दया हम पर करें ।।......आज के पावन पर्व पर माँ शारदे को नमन.रमेश जी,साधुवाद.
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Comment by रमेश कुमार चौहान on February 4, 2014 at 8:56pm

आदरणीया सादर धन्यवाद

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