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बासंती बयार
होले होले
बह रही है

तड़प रहा मन
दिल पर
लिये एक गहरा घाव
यादो का झरोखा
खोल रही किवाड़
आवरण से ढकी भाव

इस वक्त पर
उस वक्त को
तौल रही है

नयन तले काजल
लबो पर लाली
हाथ कंगन
कानो पर बाली

तेरे बाहो पर
मेरी बदन
झूल रही है

ईश्‍वर की क्रूर नियति
सड़क पर बाजार
कराहते रहे तुम
अंतिम मिलन हमारा
हाथ छुड़ा कर
चले गये तुम

तन पर लिपटी
सफेद साड़ी
हिल रही है
---------------
मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by रमेश कुमार चौहान on February 18, 2014 at 10:01am

आदरणीय "अलीन"जी एवं "गीतजी, आपके इस उत्साहवर्धन के लिये हार्दिक अभिनंदन

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 17, 2014 at 10:52pm

बहुत सुंदर भाव, बधाई स्वीकारें आदरणीय रमेश जी

Comment by अनिल कुमार 'अलीन' on February 16, 2014 at 10:00pm

भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति..............बहुत खूब.............

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 15, 2014 at 4:19pm

आदरणीय डाक्टर साहब, एवं श्याम वर्माजी, आपने इस रचना को समय एवं मान दिया सादर आभार

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 15, 2014 at 4:17pm

आदरणीया अन्नपूर्णाजी, पाठकजी, आपद्वय की सराहना से मुझे एक नई शक्ति प्राप्त हुई, आप द्वय का सादर आभार

Comment by Shyam Narain Verma on February 15, 2014 at 12:51pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.....
Comment by Meena Pathak on February 15, 2014 at 12:17pm

आख़री पंक्तियाँ मन भिगो गयीं ... बहुत सुन्दर भावपूर्ण  रचना , बधाई 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 15, 2014 at 11:18am

रमेश जी सुंदर भाव युक्त राचन के लिए तहे दिल बधाई स्वीकार करें ..सादर 

Comment by annapurna bajpai on February 14, 2014 at 11:20pm

सुंदर भाव युक्त नवगीत के लिए बधाई आपको , आ0 रमेश जी । 

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