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पाँच दोहे -- ( अन्नपूर्णा बाजपेई )

दोहे

1)  नारी है सुता ,दारा  धारे  रूप अनेक ।

     बंधन बांधे नेह का  धीरज धर्म विवेक ॥

2)  ये नारी है सृजक नहि अबला कमजोर ।

     रोम रोम ममता भरी सह पीड़ा घनघोर ॥

3)  महल दुमहले बन रहे वसुधा हरी न शेष ।

    जीव जन्तु भटके सभी  ऐसे महल विशेष ॥

4)  माया माया कर रहा बढ़े चौगुना मोह ।

    पानी पत्थर पूजि के रहा मुक्ति को टोह॥

5)  सन्मार्ग दो प्रभु दिखा,  दो ऐसा वरदान । 

    सब मिल शुचिता से रहे होवे जग कल्यान ॥ 

संशोधित  

अप्रकाशित एवं मौलिक 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 24, 2014 at 9:35pm

सुन्दर प्रयास हुआ है 

माया माया कर रहा बढ़े चौगुना मोह ।

पानी पत्थर पूजि के रहा मुक्ति को टोह॥........सुन्दर 

मात्रिकता और विधान को ध्यान रख  एक बार पुनः दोहों को देख कर दुरुस्त कर लें आदरणीया अन्नपूर्णा जी 

सादर.

Comment by बृजेश नीरज on February 21, 2014 at 7:19pm

बढ़िया दोहे हैं!

//नारी है सुता दारा// मुझे इसका अर्थ स्पष्ट नहीं हुआ.

यदि विषम और सम चरण को अलग करने के लिए कोमा का प्रयोग करना उचित न लग रहा हो तो कथ्य के हिसाब से तो जरूर करना चाहिए. जैसे- //सन्मार्ग दो प्रभु दिखा, दो ऐसा वरदान// 

बाकी, आदरणीय अरुण निगम जी के कहे पर ध्यान दें!

इस अभिव्यक्ति पर आपको हार्दिक बधाई!

Comment by annapurna bajpai on February 21, 2014 at 6:53pm

आदरणीय आशुतोष जी आपका हार्दिक आभार । 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 21, 2014 at 3:39pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी ..वर्तमान के यथार्थ का सुंदर चित्रण करते इन शानदार दोहों के लिए तहे दिल बधाई स्वीकार करें ..सादर 

Comment by annapurna bajpai on February 20, 2014 at 4:16pm

आपका हार्दिक आभार आ0 लड़ीवाला जी , शशि पुरवार  जी । 

Comment by shashi purwar on February 20, 2014 at 9:05am

आदरणीय अन्नपूर्णा जी भाव सुन्दर है अच्छा प्रयास है ,

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 19, 2014 at 6:25pm

प्रयास हेतु बधाई | श्री अरुण कुमार निगम जी की नेक सलाह गौर करने योग्य है | सादर 

Comment by annapurna bajpai on February 19, 2014 at 6:19pm

आदरणीय प्रभाकर जी मैंने मात्राओं को पुनः गिन कर दोहे ठीक कर लिये  है । आपके अनुमोदन की अभिलाषा है । सादर 

Comment by annapurna bajpai on February 19, 2014 at 6:17pm

आदरणीय अरुण निगम जी विधिवत समझाने के लिए आपका हार्दिक आभार , और तीसरे दोहे मे वसुधा हरी न शेष है , रही नहीं । आपका पुनः पुनः आभार आपने समय दिया । सादर 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on February 18, 2014 at 8:56pm

आ० अन्नपूर्णा जी, लगता है कि मात्रायों की गिनती अभी तक अच्छी तरह नहीं जानी आपने।

कृपया ध्यान दे...

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