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दान की लिखता कथा

धर्म रेखा
खींच कर
जाति बंधन से बॅधें,
प्रेम सा 
उपकार करते
साधना 
सत्कार से।
उपहास होता कर्म का
अति मर्म
जिसकों कोसता,
साधता है
स्वार्थ अपना
झोंकता
जन को सदा।
जाल बुनता है
विनय से,
फॉसता है-
अर्थ विधा।
कर्म हैं
त्रिशंकु जैसे,
दान की लिखता कथा।

के0पी0सत्यम-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 25, 2014 at 6:10pm

आ0 सौरभ सर जी, सादर प्रणाम!  ओ0बी0ओ0 के ब्लाग पर आपकी उपस्थिति ऊर्जा प्रदान करती है।  आपका हार्दिक आभार। सादर,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 22, 2014 at 9:32pm

स्प्लिट व्यक्तित्व के चित्रण का प्रयास श्लाघनीय है.

बधाई

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 1, 2014 at 7:20pm

आ0  वंदना जी,   आपका बहुत बहुत आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 1, 2014 at 7:19pm

आ0 धामी भाई जी, आपका बहुत बहुत आभार।  सादर,

Comment by Vindu Babu on February 26, 2014 at 1:04am

दोहरे व्यक्तिव का बखान करती हुई अच्छी रचना की है अपने आदरणीय केवल जी।

बधाई स्वीकारें

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 25, 2014 at 7:16am

एक भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई .आदरणीय ...

कृपया ध्यान दे...

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