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सीमाओं मे मत बांधो

   सीमाओं मे मत बांधो

 

सीमाओं मे मत बांधो, मैं बहता गंगा जल हूँ ।  

गंगोत्री से गंगा सागर

गजल  सुनाती  आई

गंगा की लहरों से निकली –

मुक्तक  और   रुबाई ।                                

भावों मे डूबा उतराता , माटी का गीत गजल हूँ

सीमाओं मे मत बांधो , मैं बहता गंगा जल हूँ ।

यमुना की लहरों पर –

किसने प्रेम तराने गाये ?

राधा ने  कान्हा संग –

जाने कितने रास रचाए ?

होंगे महल दुमहले कितने, मैं तो ताजमहल हूँ

सीमाओं मे मत बांधो , मैं बहता यमुना जल हूँ ।

मैं कबीर का ढाई आखर,

मेरा   कहाँ   ठिकाना ?

इस दुनियाँ मे लगा हुआ है

सबका   आना – जाना ।  

कबीरा का ताना बाना मैं, ढाका का मल मल हूँ

सीमाओं मे मत बांधो मैं बहता नदिया जल हूँ ।

            --- मौलिक एवं अप्रकाशित     

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 11, 2014 at 11:07pm

आदरणीय सर जी 

सादर 

सीमाओं में किसी को कोई बाँध नहीं सकता जब तक वो स्वयम न चाहे . 

गंगा को प्रदूषित कर दिया 

यमुना और ताज महल का हाल जग जाहिर है 

शानदार रचना का अस्तित्व अपनी जगह बेहतर बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 11, 2014 at 9:41pm

वाह वा !! क्या बात  है , आदरणीय , बहुत सुन्दर गीत रचना  की है , हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 11, 2014 at 7:41am

बहुत सुंदर रचना प्रस्तुति आदरणीय ब्रह्मचारी जी, हार्दिक बधाई आपको

Comment by vandana on March 11, 2014 at 5:31am

बहुत सुन्दर रचना आदरणीय संग्रहणीय !!!!

Comment by Meena Pathak on March 10, 2014 at 10:49pm
Behtareen rachna .. Saadar badhai

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