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1222- 1222- 1222

मुसीबत साथ आई हमसफर की तरह

लगे है धूप भी अब राहबर की तरह

 

सहे जाता हूँ मौसम की अज़ीयत मैं                     अज़ीयत =यातना

बियाबाँ मे किसी उजड़े शजर की तरह

 

झुलसने लगता है मन सुब्ह उठते ही

हुये दिन गर्मियों की दोपहर की तरह

 

घुटन होने लगी है इन हवाओं मे

जहाँ लगने लगा है बन्द घर की तरह

 

हिसारे ग़म से बाहर लाये कोई तो                    हिसारे ग़म= ग़म का घेरा

मुसल्सल घूमता हूँ इक भँवर की तरह

 

मौलिक व अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 17, 2014 at 8:30am

आदरणीय सौरभ सर, आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी से बहुत हौसला मिला है आपका तहेदिल से शुक्रिया

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 15, 2014 at 10:52pm

झुलसने लगता है मन सुब्ह उठते ही

हुये दिन गर्मियों की दोपहर की तरह

 

घुटन होने लगी है इन हवाओं मे

जहाँ लगने लगा है बन्द घर की तरह

सफल ग़ज़ल में ये दो शेर सफलतम बन कर उभरे हैं, शिज्जूभाई.. दिल से दाद कुबूल कीजिये.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 5, 2014 at 5:10pm

आदरणीया महिमा जी रचना की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by MAHIMA SHREE on April 3, 2014 at 8:59pm

मुसीबत साथ आई हमसफर की तरह

लगे है धूप भी अब राहबर की तरह

 

हिसारे ग़म से बाहर लाये कोई तो                   

मुसल्सल घूमता हूँ इक भँवर की तरह... बहुत खूब आ. शिज्जू जी हार्दिक बधाई स्वीकार करें /


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2014 at 6:39pm

आपका हार्दिक आभार आदरणीय बैद्यनाथ भाई

Comment by Saarthi Baidyanath on April 3, 2014 at 4:54pm

लाजवाब कहन शिज्जू साहब 

झुलसने लगता है मन सुब्ह उठते ही

हुये दिन गर्मियों की दोपहर की तरह...उम्दा 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2014 at 7:14am

आदरणीय जितेन्द्र भाई आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2014 at 7:14am

भाई आशीषजी आपका तहेदिल से शुक्रिया स्नेह बना रहे

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 2, 2014 at 11:29pm

झुलसने लगता है मन सुब्ह उठते ही

हुये दिन गर्मियों की दोपहर की तरह

 

घुटन होने लगी है इन हवाओं मे

जहाँ लगने लगा है बन्द घर की तरह.............वाह!   ढेरों बधाई आपको आदरणीय शिज्जू जी

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 2, 2014 at 11:24pm

घुटन होने लगी है इन हवाओं मे

जहाँ लगने लगा है बन्द घर की तरह  |   वाह वाह !!

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