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रात थी लेकिन अँधेरा उतना भी गहरा न था- ग़ज़ल

2122- 2122- 2122- 212

रात थी लेकिन अँधेरा उतना भी गहरा न था

सब दिखाई दे गया आँखो में जो पर्दा न था

 

झूठ की बुनियाद पर कोई महल बनता नहीं

झूठ आखिर झूठ है उसको तो सच होना न था

 

शोर था सारे जहाँ में इक लहर की बात थी

कोई दा'वा उस लहर का अस्ल में सच्चा न था

 

कहने को तो साथ मेरे कारवाँ था लोग थे

मैं वही था हाँ मगर वो दौर पहले सा न था

 

ये सफर गुज़रा बड़े आराम से तो अब तलक

आखिरश रुकना पड़ा मुझको कि अब रस्ता न था

 

आप अपनी हैसियत को लें समझ अब मोहतरम

वो सिकंदर भी झुका था जो कभी हारा न था

 

उँगलियाँ थी नाम थे पहचान थी सबकी मगर

वे सभी बस वोट थे उनका कोई चेहरा न था   

 

 मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 17, 2014 at 8:32am

आदरणीय सौरभ सर, रचना को आपका अनुमोदन मिला रचनाकर्म सार्थक हुआ, मेरी रचना को मान देने के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 17, 2014 at 12:08am

झूठ की बुनियाद पर कोई महल बनता नहीं

झूठ आखिर झूठ है उसको तो सच होना न था

 

शोर था सारे जहाँ में इक लहर की बात थी

कोई दा'वा उस लहर का अस्ल में सच्चा न था

 

कहने को तो साथ मेरे कारवाँ था लोग थे

मैं वही था हाँ मगर वो दौर पहले सा न था

उँगलियाँ थी नाम थे पहचान थी सबकी मगर

वे सभी बस वोट थे उनका कोई चेहरा न था  ... 

कमाल कमाल कमाल !  .. एका-एक शेर कमाल !!

दिल से कहा है आपने.. तो हमने भी मन से पढ़ा है. इस खूबसूरत और कामयाब ग़ज़ल के लिए दिल से दाद दे रहा हूँ.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2014 at 6:03pm

आदरणीया कुन्ती जी आपका तहेदिल से शुक्रिया जो आपने मेरी रचना के मर्म को समझा एवं सराहा


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 6, 2014 at 6:03pm

आदरणीया डॉ प्राची जी रचना को समय देने एवं सराहने के लिये आपका दिल से आभार

Comment by coontee mukerji on April 6, 2014 at 1:24pm

बहुत ही जबरदस्त मार है....शिज्जू जी.

उँगलियाँ थी नाम थे पहचान थी सबकी मगर

वे सभी बस वोट थे उनका कोई चेहरा न था   .....कोई माने या न माने..सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 5, 2014 at 9:02pm

कहने को तो साथ मेरे कारवाँ था लोग थे

मैं वही था हाँ मगर वो दौर पहले सा न था..................वाह! बहुत सही बात कही है 

इस कामयाब ग़ज़ल पर मेरी हार्दिक बधाई आ० शिज्जू जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 5, 2014 at 5:09pm

आदरणीय नीरज भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 5, 2014 at 5:08pm

आदरणीय विजय सर आपका तहे दिल से शुक्रिया

Comment by Neeraj Neer on April 5, 2014 at 11:43am

बेहतरीन ग़ज़ल कही है आदरणीय शिज्जू साहब.. बहुत बधाई .. आखिरी शेर तो कमाल ही है ..

उँगलियाँ थी नाम थे पहचान थी सबकी मगर

वे सभी बस वोट थे उनका कोई चेहरा न था   .

Comment by vijay nikore on April 5, 2014 at 11:26am

//कहने को तो साथ मेरे कारवाँ था लोग थे

मैं वही था हाँ मगर वो दौर पहले सा न था//

 

इस बहुत अच्छी गज़ल के लिए बधाई।

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