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मुक्तक // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //

मुक्तक
-------
मै भी खुश और तुम भी खुश लेकिन दुखिया सारा संसार
कथनी करनी में भेद रखता कैसे हो सुखी परिवार
आओ मिल हम खुशियां बोयें उन्नत हो सकल संस्कार
टुकड़ों में हम बंटे है फिरते सबका एक जगत आधार
------------------------------------------------------
जिंदगी की भाग दौड़ में रास्ते बदल जाते हैं
लाख रंजिश सही मिलते ही कदम ठहर जाते हैं
आसां नही यूँ ही किसी को इस कदर भुला देना
जख्म इतने सीने में सूखते फिर हरे हो जाते हैं
------------------------------------------------------
मौलिक /अप्रकाशित
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

Views: 808

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 7, 2014 at 11:02pm

आदरणीया मीना जी 

सादर 

आपका स्नेह प्राप्त हुआ , आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 7, 2014 at 11:01pm

आदरणीय श्री अखिलेश जी सादर 

स्नेह हेतु आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 7, 2014 at 11:00pm

आदरणीय श्री ब्रजेश जी 

सादर 

प्रोत्साहन हेतु आभार 

Comment by Meena Pathak on April 7, 2014 at 5:55pm

बहुत सुन्दर .. सादर बधाई 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 7, 2014 at 1:02pm

आदरणीय प्रदीप भाई , 

भावपूर्ण मुक्तक की हार्दिक बधाई।

Comment by बृजेश नीरज on April 6, 2014 at 8:10pm

वाह! बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 6, 2014 at 7:37pm

आदरणीय श्री भंडारी जी 

सादर 

प्रोत्साहन हेतु आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 6, 2014 at 7:36pm

आदरणीया कुंती दी. जी 

सादर 

प्रोत्साहन हेतु आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2014 at 1:07pm

आदरणीय प्रदीप भाई , सुन्दर , सार्थक  मुक्तक के लिये बधाइयाँ ॥

Comment by coontee mukerji on April 6, 2014 at 12:30pm

-------
मै भी खुश और तुम भी खुश लेकिन दुखिया सारा संसार
कथनी करनी में भेद रखता कैसे हो सुखी परिवार.....खूब कही खुशवाहाजी.हृदय से साधुवाद

कृपया ध्यान दे...

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