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सियासत पूछ मत तुझमें पतन क्या-क्या नहीं देखा
बहुत खुदगर्ज देखे हैं मगर तुझ सा नहीं देखा
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महज कुर्सी को दुश्मन से करे तू लाख समझौते
चरित तुझ सा किसी का भी यहाँ गिरता नहीं देखा
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सपन में भी दिखा करती मुझे तो बस सियासत ही
सियासत से मगर कच्चा कोई रिश्ता नहीं देखा
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बराबर बाटते देखी मुहब्बत भी समानों सी
बड़ा-छोटा करे माँ प्यार का हिस्सा नहीं देखा
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डपटता भी अगर है तो सुधर जा की नसीहत से
खुदा की आँख में मैंने कभी गुस्सा नहीं देखा
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ये जो जम्हूरियत कहते लुटेरों का तमाशा अब
यहाँ मालिक कहाता जो भला उसका नहीं देखा
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सुना है कल सियासतदाँ चले आए थे बस्ती में
‘मुसाफिर’ आज बस्ती में कोई बच्चा नहीं देखा
मौलिक और अप्रकाशित
Comment
सियासत पूछ मत तुझमें पतन क्या-क्या नहीं देखा
बहुत खुदगर्ज देखे हैं मगर तुझ सा नहीं देखा
महज कुर्सी को दुश्मन से करे तू लाख समझौते
चरित तुझ सा किसी का भी यहाँ गिरता नहीं देखा
khoob sir ji gazal achchhi lagi badhai,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
अच्छी प्रस्तुति आदरणीय ,बधाई |
बहुत मार्मिक रचना है..आपको हार्दिक बधाई.
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