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बह्र : रमल मुसम्मन महजूफ

वज्न : २१२२, २१२२, २१२२, २१२

मध्य अपने आग जो जलती नहीं संदेह की,
टूट कर दो भाग में बँटती नहीं इक जिंदगी.

हम गलतफहमी मिटाने की न कोशिश कर सके,
कुछ समय का दोष था कुछ आपसी नाराजगी,

आज क्यों इतनी कमी खलने लगी है आपको,
कल तलक मेरी नहीं स्वीकार थी मौजूदगी,

यूँ धराशायी नहीं ये स्वप्न होते टूटकर,
आखिरी क्षण तक नहीं बहती ये आँखों की नदी,

रात भर करवट बदलना याद करना रात भर,
एक अरसे से यही करवा रही है बेबसी.

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Maheshwari Kaneri on June 1, 2014 at 8:07pm

म गलतफहमी मिटाने की न कोशिश कर सके,
कुछ समय का दोष था कुछ आपसी नाराजगी,.........लाजवाब


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 2, 2014 at 1:02am

ग़ज़लियत से अश-अश करती इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई,भाई अरुन अनन्तजी. सार्थक ग़ज़ल हुई है.  किसी एक शेर पर क्या कहूँ हर शेर पर मुग्ध होता रहा. 

शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 30, 2014 at 5:36pm

हम गलतफहमी मिटाने की न कोशिश कर सके,
कुछ समय का दोष था कुछ आपसी नाराजगी,.............बहुत खूब 

सुन्दर ग़ज़ल हुई है प्रिय अरुण अनंत जी 

हार्दिक बधाई 

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 21, 2014 at 1:18pm

वाह आदरणीय एक बेहतरीन गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल कही ......लाजवाब
सादर

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 21, 2014 at 11:24am

आदरणीय प्रदीप सर बहुत बहुत शुक्रिया सराहना हेतु

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 21, 2014 at 11:23am

आदरणीय शिज्जू भाई जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका गज़ल आपको पसंद आई

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 21, 2014 at 11:23am

हार्दिक आभार आदरणीया महेश्वरी जी

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 21, 2014 at 11:22am

हार्दिक आभार अनुज राम

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 21, 2014 at 11:22am

आदरणीय लक्ष्मण जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 21, 2014 at 11:22am

वैद्यनाथ भाई ग़ज़ल आपको पसंद आई सुनकर प्रसन्नता हुई सराहना हेतु बहुत बहतु शुक्रिया आपका

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