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आदमी (प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा )

आदमी 
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ऊँची ऊँची अट्टालिकाएं
बौने लोग
विकृति और स्वभाव
एक दूजे के
पर्यायवाची

चाहरदीवारी के मध्य
शून्य
वर्जनाओं के टूटने का
उदघोष
खामोशी से सुनते हुए
ध्वनि प्रतिध्वनि
संज्ञा शून्य

आहत भावनाये
रिसता खून
अँगुलियों से चाटते हुए
शायद
ये भी नमकीन है
अपनों के लहू जैसा

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा
मौलिक /अप्रकाशित
२०.०४.२०१४

Views: 1279

Comment

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Comment by savitamishra on April 21, 2014 at 11:22pm

बहुत सुन्दर

Comment by Sarita Bhatia on April 21, 2014 at 1:45pm

बहुत उत्कृष्ट 

Comment by Anurag Singh "rishi" on April 21, 2014 at 1:10pm

वाह बेहद सुन्दर  भाव संजोये है आदरणीय

Comment by बृजेश नीरज on April 21, 2014 at 9:51am

बहुत ही उत्कृष्ट कविता! अब आप अपनी फॉर्म में हैं.

आपको बहुत-बहुत बधाई!

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