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कविता--मैं आज भी खडा हूँ उसी मोड़ पर

कभी जिस जगह हम मिले थे

जहाँ फूल मुहब्बत के खिले थे

मैं आज भी खड़ा हूँ उसी मोड़ पर

जहाँ तुम गये थे मुझे छोडकर

हँसी से कोई ऱिश्ता नहीं है

खुशी से दूर तक वास्ता नहीं है

जमाने की कितनी परवाह थी मुझे

अब जमाने की भी कोई परवाह नहीं है

गुजरते हैं लोग इस चौरेहे से

तेरी चर्चा करते हुये

मैंने बहुत को देखा है 

तेरे लिये आह भरते हुये

लेकिन उनकी आह भरने पर

मुझे तरस जरूर आता है

किआज भी हर कोई शख्स

तुझे पहचान नहीं पाता है

तेरे लुटे हुये को 

मैं कुछ आसरा देता हूँ

इसी बहाने आज भी

तेरा हाल जान लेता हूँ

उमेश कटारा

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 750

Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 1, 2014 at 10:31pm

बहुत सुंदर रचना ,हार्दिक बधाई आपको आदरणीय उमेश जी

Comment by umesh katara on May 1, 2014 at 5:11pm

शुक्रिया डा.आशुतोष मिश्रा जी

Comment by umesh katara on May 1, 2014 at 5:11pm

शुक्रिया अखिलेश कृष्ण जी

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on May 1, 2014 at 1:27pm

आदरणीय उमेश भाई

यह मात्र कविता नहीं , बहुतॉं का यथार्थ है, हार्दिक बधाई 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 1, 2014 at 12:52pm

कभी जिस जगह हम मिले थे

जहाँ फूल मुहब्बत के खिले थे

मैं आज भी खड़ा हूँ उसी मोड़ पर

जहाँ तुम गये थे मुझे छोडकर

हँसी से कोई ऱिश्ता नहीं है....manbhavan is shandar rachna ke liye tahe dil badhaaayee saadar 

Comment by umesh katara on May 1, 2014 at 8:02am

शुक्रिया कुन्ती मुखर्जी मैम आपका तहेदिल से शुक्रिया

Comment by umesh katara on May 1, 2014 at 8:01am

शुक्रिया श्याम जी 

Comment by umesh katara on May 1, 2014 at 8:00am

शुक्रिया अखण्ड गहमरी जी

Comment by umesh katara on May 1, 2014 at 7:59am

शुक्रिया रमेश जी

Comment by रमेश कुमार चौहान on April 30, 2014 at 2:27pm

आदरणीय कटाराजी इस सुंदर रचना के लिये बधाई

कृपया ध्यान दे...

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