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आचरण सबको यहाँ अब है नकाबों की तरह - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122    2122    2122    212

***
हर खुशी  हमको  हुई  है अब सवालों  की तरह
और दुख आकर मिले हैं नित जवाबों की तरह
***
चाँद  निकला  तो  नदी में  देख छाया  खुश रहे
रोटियाँ  अब हम गरीबों को  खुआबों  की तरह
***
यूं कभी  जिसमें कहाये  यार हम  महताब थे
उस गली में आज क्यों खाना खराबों की तरह
***
एक भी आदत नहीं ऐसी कि तुझको  गुल कहूँ
पास काँटें क्यों रखो फिर तुम गुलाबों की तरह
***
है हमें तो जिन्दगी में साँस-धड़कन यार ज्यों
आप को  माना  मुहब्बत है  शराबों  की तरह
***
कौन क्या, मुश्किल  हुई  पहचान  चाहे धूप हो
आचरण सबको  यहाँ अब, है नकाबों  की तरह
***
किस तरह  नंगा किया  है,  देखिए  बाजार  ने
डायरी थे, बिक  रहे जो अब  किताबों की तरह

***
मैलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Satyanarayan Singh on May 23, 2014 at 5:10pm

इस शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय 

हर खुशी  हमको  हुई  है अब सवालों  की तरह
और दुख आकर मिले हैं नित जवाबों की तरह........सुन्दर भाव 
***
चाँद  निकला  तो  नदी में  देख छाया  खुश रहे
रोटियाँ  अब हम गरीबों को  खुआबों  की तरह...........बहुत खूब 
***

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 15, 2014 at 10:44am

आदरणीय भाई सौरभ जी , ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 14, 2014 at 5:14pm

अच्छे अश’आर हुए हैं, भाईजी. दाद कुबूल करें

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 3, 2014 at 8:29pm

आदरणीय मुकेश भाई ग़ज़ल पर प्रतिक्रिया और प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on May 3, 2014 at 6:41pm

आदरणीय लक्ष्मण जी
बहुत अच्छी ग़ज़ल है. मुबारकबाद क़ुबूल करें

कौन क्या, मुश्किल  हुई  पहचान  चाहे धूप हो
आचरण सबको  यहाँ अब, है नकाबों  की तरह

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 3, 2014 at 10:55am

आदरणीय बंधू गिरिराज जी , ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए आभार . मार्गदर्शन करते रहिये .. शुभेच्छा ..

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 3, 2014 at 10:53am

आदरणीय भाई जीतेन्द्र जी , हर असआर पर तफ्तीश से विचार देने के लिए हार्दिक धन्यवाद .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 2, 2014 at 10:24pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , खूब बढिया गज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

एक भी आदत नहीं ऐसी कि तुझको  गुल कहूँ
पास काँटें क्यों रखो फिर तुम गुलाबों की तरह ------------ बहुत खूब , भाई जी बधाई !!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 2, 2014 at 2:52pm

हर खुशी  हमको  हुई  है अब सवालों  की तरह
और दुख आकर मिले हैं नित जवाबों की तरह.............बहुत गहरे भाव, सच! इंसान को दूसरों पर सवाल रखने में बहुत ख़ुशी मिलती है किन्तु जवाब में..

कौन क्या, मुश्किल  हुई  पहचान  चाहे धूप हो
आचरण सबको  यहाँ अब, है नकाबों  की तरह..............वाह! क्या कहने

किस तरह  नंगा किया  है,  देखिए  बाजार  ने
डायरी थे, बिक  रहे जो अब  किताबों की तरह................बहुत बहुत खूब

बहुत अच्छी गजल हुई आदरणीय लक्ष्मण जी, हार्दिक बधाई आपको

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 2, 2014 at 10:09am

आदरणीय कुंती बहन आपको ग़ज़ल अच्छी लगी .मन में ख़ुशी हुई . उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद .

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