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दर्द भूख का यारो - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

मौत   बेटियों   को  बस,  दाइयाँ  समझती  हैं

पीर  के  सबब  को  सब  माइयाँ  समझती  हैं

**

सोच  आज  तक  भी जब,  है  गुलाम जैसी ही

मुल्क  की  अजादी  क्या, बेडि़याँ  समझती हैं

**

दो  बयाँ  भले  ही  तुम  देश  की  तरक्की के

हर खबर है सच कितनी सुर्खियाँ समझती हैं

**

आप   के  बयानों  में    खूब   है  सफाई  पर

बेवफा  कहाँ  तक  हो,   पत्नियाँ  समझती हैं

**

दोष  तुम  निगाहों   को  बेरूखी  की  देते  हो

कान  कौन  भरता  है  बालियाँ  समझती  हैं

**

पायलों को छमछम  की आदतें  जनम से ही

कब  किसे  रिझाना  है  चूडि़याँ  समझती  हैं

**

जिश्म  को  बिछाया  है लाल के  बिलखने से

दर्द   भूख   का  यारो   रोटियाँ   समझती  हैं

**

क्या कहें ‘मुसाफिर’ को चुप रहा सफर में गर

मौन  क्यों जुबाँ  है ये  तल्खियाँ  समझती हैं

**

212   1222  212  1222

**

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Shyam Narain Verma on May 16, 2014 at 5:38pm
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।

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