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कुहरा धना है गजल तरही गजल

2122 2122 2122
मत कहो आकाश में कुहरा धना है
जाल धुमते बादलो ने बस बुना है

धूप की चादर अभी फैली फिजा में
चाँदनी को चाँद से मिलना मना है

भूल से भी हम न तड़़पाये तुझे थे
दे गवाही आज वो तेरा अना है

फूल भी रोने लगे तब से चमन में
रौद देगा माली ही जब से सुना है

नींद भी तब से नहीं आती किसी को
आदमी शैतान ही जब से बना है

आज ये सुन  शर्म खुद रोने लगा क्‍यों
औरतो ने राह पर  बच्‍चा जना है

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

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Comment

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Comment by annapurna bajpai on June 4, 2014 at 7:38am

आ0 अखंड जी सुंदर गजल हेतु बहुत बधाई , आ0 केसरी जी के कहे पर भी ध्यान दें लें । सादर 

Comment by वीनस केसरी on June 4, 2014 at 4:31am

भाई जी आपसे एक जानकारी चाहता हूँ कि घना के साथ बुना काफिया सही है
मेरे जानकारी में तो शायद ये गलत है

आशा है आप शंका का समाधान करेंगे


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 2, 2014 at 4:34pm

बह्र को खूब निभाया आदरणीय अखंड भाई बहुत बहुत बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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