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जिंदगी ढूंढते रह गए तुझको ---डा० विजय शंकर

जिंदगी , कितनी सरल , खूबसूरत है तू
तुझको देखें जी भर , कि जी लें तुझको ,
कैसे रखा , कैसे पाला है , हमने तुझको,
तुझको पढ़ें मन भर , कि लिखें तुझको |

बोझ ,शौक ,मौज नाम दिए हमने तुझको
ये रीति, ये रिवाज ,ये बंदिशें , ये विधान
ये दायरे ,ये पहरे ,ये कानून , ये फरमान
ये भी तेरे हैं , तेरे बन्दों ने दिए हैं तुझको |

बाँध के रख दिया हजार बंधनों में तुम्हें
दावा यह कि सब तेरी हिफाजत के लिए है
इतनी बंदिशें तूने न देखी , न जानी होगीं ,
जितनी हमने तेरी सौगात में दे दी हैं तुझको |

सारे रूप , श्रृंगार धरती पर तेरे हैं ,तुझसे
हम अपने ढंग से सजाते रह गए तुझको
ये सजावटें, ये बनावटें हमसे दूर ले गयीं तुझको
हम कानूनों और किताबों में ढूंढते रह गए तुझको |

डा० विजय शंकर

( मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Vijai Shanker on June 12, 2014 at 8:03pm
आपकी प्रेरक अभिव्यक्ति के लिए धन्यवाद , आ ० अन्नपूर्णा बाजपेयी जी.
Comment by Dr. Vijai Shanker on June 12, 2014 at 7:58pm
प्रिय गिरिराज जी , आपको पंक्तियाँ पसंद आईं , धन्यवाद .
Comment by Dr. Vijai Shanker on June 12, 2014 at 7:56pm
प्रिय गिरिराज जी , आपको पंक्तियाँ पसंद आईं , धन्यवाद .
Comment by annapurna bajpai on June 12, 2014 at 7:47pm

सुंदर रचना , बधाई स्वीकारें । 

Comment by umesh katara on June 12, 2014 at 7:29pm

बहुत भावपूर्ण रचना है बधाई हो


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 12, 2014 at 6:36pm

आदरणीय विजय भाई , बहुत अच्छी रचना की है , ज़िन्दगी को आपने नया नज़रिया दिया है , बधाई ॥

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 12, 2014 at 5:29pm
बहुत बहुत धन्यवाद नरेंद्र सिंह जी
Comment by Dr. Vijai Shanker on June 12, 2014 at 11:36am
बात जो समझ में आ जाये
बात जो मन को भा जाये
जीवन अच्छे से काट जाये
बाकि और क्या है जिंदगी .
आ ० गोपाल जी , पंक्तियाँ आपको अच्छी लगी , धन्यवाद , बहुत बहुत ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 12, 2014 at 11:28am

विजय जी

जिन्दगी को एक नए अंदाज से खंगालने की आपकी कोशिश  बड़ी पुरअसर है i शुभकामनाये i

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 12, 2014 at 11:12am
धन्यवाद श्री लक्ष्मण धामी जी.

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