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लघुकथा : खोटा सिक्का (गणेश जी बागी)

                       "अजी सुनती हो! देख लो तुम्हारे लाड़ले की करतूत, सेकंड इयर का रिज़ल्ट आया है, खीँच खांच के पास हुए हैं जनाब,  दिनभर दोस्तो के साथ मटरगश्ती और मारपीट करते रहते हैं, अब तो बर्दाश्त से बाहर हो गया है |"

                        "अब जाने भी दीजिए जी, बच्चा है, थोड़ी-बहुत ग़लतियाँ तो हो ही जाती हैं, आपको पता है,  बिटिया बता रही थी कि भाई के कारण ही कॉलेज मे कोई उसकी तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं करता।"


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by शिज्जु "शकूर" on June 30, 2014 at 3:15pm

आदरणीय गणेश जी काफी समय बाद आपकी कोई रचना आई है, इस असरदार लघुकथा के लिये आपको दिली मुबारकबाद

Comment by कल्पना रामानी on June 30, 2014 at 3:11pm

आपकी लघुकथाएँ बहुत अच्छी लगती हैं। काफी समय बाद फिर पढ़ने को मिली आदरणीय गणेश जी। कम शब्दों में गहरे भाव लिए बहुत सुंदर लघुकथा के लिए आपको बहुत बधाई

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 30, 2014 at 2:24pm

आदरणीय बागी जी

जहाँ पर आपने कथा अधूरी छोडी , सारा मर्म तो वही पर है i  घर की महिलाये ही लड़को के दोष पर  पर्दा डालती रहती है i परिणाम  में वे समाज के नासूर बनते है i फिर ------

Comment by Maheshwari Kaneri on June 30, 2014 at 2:02pm

बहुत अच्छी लघुकथा ,हार्दिक बधाई आपको आदरणीय बागी जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 30, 2014 at 12:39pm

 बहुत अच्छी लघुकथा ,आपकी लघुकथा पढ़ने का बड़ी बेचैनी से इंतज़ार रहता है शीर्षक पढ़कर ही ऐसा लगने लगता है कि न जाने क्या भेद खुलने वाला है   :)) 

हार्दिक बधाई आपको आदरणीय बागी जी

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