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माँ, बहन, बेटी के आँसू

 

माँ, बहन, बेटी के आँसू पे यहाँ रोता है दिल

रोज़ लुटती अस्मतें, क़त्लों का ग़म ढोता है दिल |

 

आबरू को उम्रदारों ने भी बदसूरत किया

मर्दों का बचपन भी है बदकार बद होता है दिल |

 

शाहो-साहब औ’ गँवारों सब में बद शह्वानीयत  

सब की आँखों में चढ़ा शर्मो-हया खोता है दिल |

 

है हुक़ूमत बेअसर बेख़ौफ़ हैं ज़ुल्मो-ज़बर  

हर घड़ी हर साँस जैसे ख़ार पे सोता है दिल |

 

आज भी शै की तरह हैं घर या बाहर औरतें

बेरहम इंसाफ़ भी तेज़ाब से धोता है दिल |

 

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

-- संतलाल करुण 

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Comment by Santlal Karun on July 20, 2014 at 9:18pm

आदरणीया मीना पाठक जी,

ग़ज़ल की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

Comment by Meena Pathak on July 20, 2014 at 8:29pm

बेहतरीन गज़ल ..बधाई आदरणीय 

Comment by Santlal Karun on July 10, 2014 at 4:15pm

आदरणीय सौरभ जी,

ग़ज़ल पढ़ने और दाद देने के लिए हार्दिक आभार !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 10, 2014 at 12:28am

आपकी कोई ग़ज़ल पहली दफ़े पढ़ी हमने आदरणीय .. इंतज़ार रहेगा.

सादर दाद कुबूल कीजिये.

Comment by Santlal Karun on July 6, 2014 at 2:51pm

आदरणीया पारुल जी,

ग़ज़ल की प्रशंसा और उसमें व्यक्त सामाजिक सच पर प्रतिक्रिया के लिए सहृदय आभार !

Comment by Santlal Karun on July 6, 2014 at 2:49pm

आदरणीय लडियावाला जी,

प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

Comment by Santlal Karun on July 6, 2014 at 2:47pm

आदरणीय लक्ष्मन जी,

ग़ज़ल और शेर की तारीफ़ के लिए हार्दिक आभार !

Comment by Santlal Karun on July 6, 2014 at 2:45pm

आदरणीया मंजरी जी,

ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

Comment by Santlal Karun on July 6, 2014 at 2:44pm

आदरणीय डॉ. श्रीवास्तव जी,

रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

Comment by parul 'pankhuri' on July 5, 2014 at 4:38pm

आदरणीय आज के घिनोने सच को बहुत प्रभावी ढंग से आपने गजल में कह दिया ..बहुत सुन्दर सृजन 

कृपया ध्यान दे...

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