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ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २


पीते अश्क़ समंदर के आवारा ये बादल
लुटते हैं दुनिया के लिए हमेशा ये बादल


माँगा नहीं हिसाब कभी अपने अहसानो का
निभा रहे हैं दस्तूर भी निराला ये बादल


हर एक चेहरे पर देखो प्यास झुलसती सी
किसकी प्यास बुझाए एक अकेला ये बादल


कभी रुलाये कभी हसए बतियाये संग में
कजरारी आँखों की याद दिलाता ये बादल


गरजकर सुनाये हाले दिल भी अपना लेकिन
सब दरवाजे बंद खड़ा तनहा ये बादल


दुनिया में बदनाम दो ही शख्स आवारापन में
इक कोई गुमनाम फ़कीर दूसरा ये बादल


मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by gumnaam pithoragarhi on July 16, 2014 at 5:37pm

धन्यवाद दोस्तो,,,,,,,,,,,,,,,,,,  सर जहाँ तक मैंने पड़ा है मुझे लगता है ये छूट ली जा सकती है ,,,,,,, और तरही ग़ज़ल ने भी इसे साबित कर दिया ,,,,,,,,, बाकी विद्वान जन भी बता देगे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2014 at 12:05pm

बदलों की महिमा का बखान करती इस बेहतरीन मुसलसल गजल के लिए बहुत बहुत बधाई आ0 गुमनाम भाई ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 15, 2014 at 5:00pm

आदरणीय ग़ज़ल तो बेहद पसंद आये अपनी जानकारी के लिए बह के बिषय में कुछ जानकारी चाहता हूँ ..क्या इसमें भी २२ को १२१   ११२ २११ करने की सुबिधा है जैसा इस बार तरही मुशायरे के ग़ज़ल में है ...कृपया जानकारी देने का कष्ट करें सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 13, 2014 at 12:04pm

बहुत बढ़िया आदरणीय गुमनाम जी बहुत बहुत बधाई

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 13, 2014 at 11:16am

dhanywaad sir ji ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 12, 2014 at 4:21pm

आदरनीय गुमनाम भाई , अच्छी गज़ल कही है , दिली बधाई स्वीकार करें ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 12, 2014 at 11:06am

अति सुन्दर

दुनिया में बदनाम दो ही  शख्स -------

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