धूप
जिधर देखो आज
धुन्धलाइ सी है धूप.
न जाने आज क्यों?
कुम्हलाई सी है धूप.
आसमाँ के बादलों से
भरमाई सी है धूप.
पखेरूओं की चहचाहट से
क्यों बौराई सी है धूप?
पेड़ों की छाँव तले
क्यों अलसाई सी है धूप?
चैत के माह में भी
बेहद तमतामाई सी है धूप.
हवाओं की कश्ती पर सवार
क्यों आज लरज़ाई सी है धूप?
"मौलिक व अप्रकाशित"वीणा सेठी.
Comment
सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर................. |
बहुत मार्मिक भाव हैं। बधाई।
अच्छी लगी आपकी धूप .... सुन्दर रचना ...बधाई
प्रस्तुति की कोमलता प्रभावित करती है, आदरणीया..
हार्दिक शुभकामनाएँ
सुंदर रचना
महनीया
सुन्दर सतरंगी है धूप !
आदरणीया सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई
//पखेरूओं की चहचाहट से
बौराई सी है धूप?
पेड़ों की छाँव तले
अलसाई सी है धूप?
चैत माह में भी
तमतामाई सी है धूप.
हवाओं की कश्ती पर
लरज़ाई सी है धूप?//
कविता अच्छी लगी, बहुत बहुत बधाई आदरणीया वीणा सेठी जी।
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